मुंबई। Bombay High Court ने ट्रैफिक नियमों के पालन और नागरिक जिम्मेदारी को लेकर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि अब समय आ गया है कि देश के लोग सिविक सेंस अपनाएं और बिना किसी दबाव के नियमों का पालन करें।
यह टिप्पणी जस्टिस Jitendra Jain की एकल पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जो सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत से जुड़ा था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय नागरिक जब विदेश जाते हैं तो वहां के ट्रैफिक नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं, लेकिन अपने देश में लौटते ही लापरवाही बरतते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इसके लिए कोई भी बहाना स्वीकार्य नहीं है।
साथ ही अदालत ने माता-पिता और बड़ों की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि वे खुद नियमों का पालन करें, ताकि बच्चों में भी अच्छी आदतें विकसित हों।
कोर्ट ने कहा कि अक्सर लोग सिग्नल की अनदेखी करते हुए सड़क पार करते हैं, जिससे दुर्घटनाएं होती हैं। विशेष रूप से दोपहिया वाहन चालकों द्वारा नियमों के उल्लंघन पर चिंता जताई गई। अदालत ने ट्रैफिक पुलिस की सराहना करते हुए कहा कि नियम तोड़ने वालों के खिलाफ और सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
यह मामला एक याचिका से जुड़ा था, जिसमें मृतक के परिवार ने मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। इससे पहले Motor Accident Claims Tribunal (MACT) ने अप्रैल 2016 में 13 लाख रुपये का मुआवजा दिया था।
जानकारी के अनुसार, पीड़ित Parkinson’s Disease से पीड़ित था और आंशिक रूप से लकवाग्रस्त था। नवंबर 2012 में ठाणे में सड़क पार करते समय उसे म्युनिसिपल ट्रांसपोर्ट की बस ने टक्कर मार दी थी। इलाज के दौरान मार्च 2013 में उसकी मौत हो गई।
अदालत ने माना कि इस मामले में कुछ हद तक लापरवाही मृतक की भी थी, क्योंकि उसकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए उसे किसी की मदद से सड़क पार करनी चाहिए थी।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि बस चालक को अधिक सतर्कता बरतनी चाहिए थी और एक असहाय व्यक्ति को देखकर वाहन की गति कम करनी चाहिए थी।
सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि 13 लाख से बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दी।
इस फैसले के जरिए Bombay High Court ने साफ संदेश दिया है कि सड़क सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों की जिम्मेदारी भी है। नियमों का पालन करके ही दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है।
