नई दिल्ली। मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव और आपूर्ति संकट के बीच भारत ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाते हुए अपनी मुद्रा में तेल खरीदना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, जहां कई देश अब भी डॉलर या युआन पर निर्भर हैं, वहीं भारत रुपये में भुगतान कर वैश्विक ऊर्जा बाजार में नया संदेश दे रहा है।
बताया जा रहा है कि ईरान द्वारा क्षेत्र में सैन्य और ऊर्जा ठिकानों पर हमलों के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इस बीच ईरान ने भारत, चीन और रूस जैसे देशों के जहाजों को पारगमन की अनुमति दी है, जिससे भारत को ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिली है।
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियां अब रूस से तेल खरीद के लिए अमेरिकी डॉलर की बजाय रुपये का उपयोग कर रही हैं। यह राशि विदेशी खातों में जमा की जाती है, जिसे बाद में यूएई के दिरहम या चीनी युआन में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया से डॉलर-आधारित सिस्टम पर निर्भरता कम होती है और लेनदेन अधिक लचीला बनता है।
जानकारी के अनुसार, भारत ने अप्रैल 2026 के लिए रूस से करीब 6 करोड़ बैरल तेल खरीदा है। यह कदम मिडिल-ईस्ट में आपूर्ति बाधित होने के बीच देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अहम माना जा रहा है। इससे पहले कीमतों में बढ़ोतरी के कारण रूसी तेल आयात में कुछ कमी आई थी, लेकिन अब फिर तेजी देखने को मिल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये में तेल खरीदने की पहल से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की पकड़ को चुनौती मिल सकती है। इससे भविष्य में रुपये को मजबूती मिलने की संभावना भी जताई जा रही है।
यह कदम भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में उसकी बढ़ती भूमिका को भी दर्शाता है।
