अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों का बचाव करते हुए कहा है कि तेहरान न्यूक्लियर हथियार बनाने की कगार पर था। ट्रंप ने दावा किया कि अगर अमेरिका ने पहले कार्रवाई नहीं की होती, तो ईरान हमला कर सकता था।
ट्रंप ने कहा, “बातचीत और खुफिया रिपोर्ट से संकेत मिल रहे थे कि ईरान पहले हमला करने की तैयारी में था। मैं ऐसा नहीं होने देना चाहता था।” उन्होंने ईरानी शासन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यदि उसके पास परमाणु हथियार होता तो वह उसका इस्तेमाल करने से नहीं हिचकता।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरान लंबे समय से क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है और हमलों के बाद उसकी सैन्य क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुंचा है।
ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की ईरान परमाणु समझौते (न्यूक्लियर डील) की आलोचना की। उनका कहना था कि उस समझौते ने ईरान को मध्य-पूर्व में मजबूत किया। ट्रंप ने दावा किया कि यदि वह डील समाप्त नहीं की जाती, तो ईरान तीन साल पहले ही परमाणु हथियार हासिल कर सकता था।
रिपोर्ट्स के अनुसार 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई शहरों में सैन्य ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल साइट्स को निशाना बनाया। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मारे जाने का दावा किया गया है।
इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइल व ड्रोन हमले किए। हमलों का दायरा इजरायल, बहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन तक बताया जा रहा है। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है।
व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के मुद्दे पर दोनों देश एकमत हैं। मर्ज ने भी तेहरान के शासन को लेकर सख्त रुख का संकेत दिया।
अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब आगे की कूटनीतिक और सैन्य गतिविधियों पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़े वैश्विक प्रयासों की जरूरत होगी।
