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महाशिवरात्रि पर उत्तराखंड में गूंजा ‘हर-हर महादेव’, मंदिरों में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

देवभूमि उत्तराखंड में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से वातावरण शिवमय हो उठा। तड़के सुबह से ही प्रदेशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। भक्तों ने भगवान आशुतोष का जलाभिषेक कर पंचामृत, गंगाजल, सफेद पुष्प, बेलपत्र, आक के फूल और कमल गट्टे से विधिवत पूजा-अर्चना की।

राजधानी देहरादून सहित पूरे प्रदेश के प्रमुख शिव मंदिरों को भव्य रूप से सजाया गया है। सुरक्षा व्यवस्था के भी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्ण तरीके से दर्शन और पूजन कर सकें।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेशवासियों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि यह पर्व शिव और शक्ति की आराधना का प्रतीक है, जो प्रेम, एकता और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस वर्ष की महाशिवरात्रि अत्यंत विशेष मानी जा रही है। नारायण ज्योतिष संस्थान के आचार्य विकास जोशी के अनुसार, इस दिन कुंभ राशि में बुधादित्य, शुक्रादित्य, लक्ष्मी नारायण और चतुर्ग्रही योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि, प्रीति, ध्रुव और व्यतिपात जैसे शुभ योग बन रहे हैं। ग्रह-नक्षत्रों की यह स्थिति साधना और उपासना के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

आचार्य जोशी ने बताया कि भगवान शिव की पूजा तीन प्रकार से की जाती है—सात्विक, राजसिक और तामसिक। गृहस्थ प्रायः सात्विक और राजसिक पूजा करते हैं। सात्विक पूजा में दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, पुष्प और फल अर्पित किए जाते हैं, जबकि राजसिक पूजन में भांग, धतूरा, रुद्राक्ष और कमल पुष्प का प्रयोग होता है। अघोर साधना में भस्म आरती और भस्म श्रृंगार का विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि की रात्रि में किए गए सभी प्रकार के पूजन को विशेष फलदायी माना गया है।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी, रविवार को शाम 5:04 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी, सोमवार को शाम 5:34 बजे तक रहेगी। महाशिवरात्रि की यह रात्रि केवल व्रत और पूजन का अवसर ही नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना और शिव कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ संयोग भी मानी जाती है।

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