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देवीधुरा में ऐतिहासिक बग्वाल का भव्य आयोजन, CM धामी ने की मां वाराही की पूजा

चम्पावत। विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां वाराही धाम देवीधुरा में रक्षाबंधन के पावन अवसर पर ऐतिहासिक बग्वाल मेले का भव्य आयोजन हुआ। आस्था, परंपरा, लोक संस्कृति और उत्साह से सराबोर इस मेले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी प्रतिभाग किया। मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से देवीधुरा हेलीपैड पहुंचे, जहां जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान पारंपरिक छोलिया नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति भी दी गई।

मुख्यमंत्री धामी ने मां वाराही देवी की विधिवत पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की। उन्होंने प्रदेशवासियों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मां वाराही मइया सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें।

बग्वाल उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति का प्रतीक

मुख्यमंत्री ने देवीधुरा की पावन भूमि और ऐतिहासिक बग्वाल मेले को उत्तराखंड की आस्था, समृद्ध लोक-संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आधुनिक विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों, लोक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि विकास को केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।

मंदिरों के विकास पर करोड़ों रुपये खर्च

मुख्यमंत्री ने बताया कि ‘मानसखंड मंदिर माला मिशन’ के तहत कुमाऊं क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों का कायाकल्प किया जा रहा है। देवीधुरा मंदिर परिसर में 4.27 करोड़ रुपये की लागत से गढ़वाल खाम भवन और 4.57 करोड़ रुपये की लागत से रणकोची मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य चल रहे हैं।

इसके अलावा घटोत्कच मंदिर का सौंदर्यीकरण, घटकु हिडिंबा मंदिर का निर्माण, सप्तेश्वर महादेव मंदिर में स्नानघाट और लधौनधुरा मेला स्थल का सौंदर्यीकरण पूरा किया जा चुका है।

मुख्यमंत्री के अनुसार घटोत्कच से झालिमाली मंदिर मार्ग के डामरीकरण पर 1.95 करोड़ रुपये, विभिन्न मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए 4.70 करोड़ रुपये और पूर्णागिरि मार्ग पर 5 करोड़ रुपये की स्ट्रीट लाइट परियोजना पर कार्य किया जा रहा है। विगत पांच वर्षों में धार्मिक अवस्थापना एवं सौंदर्यीकरण के तहत 68.58 करोड़ रुपये की लागत से 397 कार्य किए गए हैं।

देवीधुरा में बनेगी मल्टी लेवल पार्किंग

मुख्यमंत्री ने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की बात कही। उन्होंने बताया कि देवीधुरा में 9.80 करोड़ रुपये की लागत से मल्टी लेवल पार्किंग का निर्माण कराया जाएगा।

उन्होंने कहा कि बग्वाल मेले को ‘राजकीय मेला’ घोषित किया गया है, जिससे इसकी गरिमा बढ़ने के साथ-साथ मेले की व्यवस्थाओं को भी और बेहतर बनाया जा सकेगा।

चार खाम और सात थोक के बीच हुई ऐतिहासिक बग्वाल

मां वाराही धाम में चार खाम और सात थोक के बीच खेली जाने वाली ऐतिहासिक बग्वाल का मुख्यमंत्री ने भी अवलोकन किया। प्रधान पुजारी की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद बग्वाल की शुरुआत हुई।

इसके बाद चारों खाम—वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया—के बग्वालियों ने मैदान में प्रवेश किया। अलग-अलग रंगों की पारंपरिक पोशाक और पगड़ियां पहने बग्वालियों के हाथों में बांस और रिंगाल से बनी ढालें थीं। शंखनाद और मां वाराही के जयकारों के बीच ऐतिहासिक बग्वाल शुरू हुई।

8 मिनट तक चला अनोखा आयोजन

फलों और फूलों की बरसात के बीच पूरा बग्वाल मैदान मां वाराही के जयकारों से गूंज उठा। इस वर्ष बग्वाल दोपहर 1:48 बजे शुरू होकर 1:55 बजे समाप्त हुई। करीब 8 मिनट तक चले इस अनूठे आयोजन में फल और फूलों का प्रयोग कर सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत रखा गया।

पीठाचार्य पंडित कीर्तिबल्लभ जोशी के अनुसार फल-फूलों से खेली जाने वाली बग्वाल को शुभ और फलदायी माना जाता है। खामों के आगमन और बग्वाल के संचालन की जिम्मेदारी भी पीठाचार्य कीर्तिबल्लभ जोशी ने निभाई।

‘विकास भी और विरासत भी’ का संकल्प

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि धार्मिक पर्यटन का उद्देश्य स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना भी है। उन्होंने प्रदेशवासियों और विशेष रूप से युवा पीढ़ी से अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सक्रिय भागीदारी की अपील की।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी है। सरकार का प्रयास है कि विकास के साथ विरासत का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। इसी भावना के साथ मुख्यमंत्री ने ‘विकास भी और विरासत भी’ के संकल्प को दोहराया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि मां वाराही की यह अनोखी विरासत केवल देवीधुरा के बग्वाल मैदान में देखने को मिलती है। उन्होंने बग्वाल की परंपरा को अनुशासन और भाईचारे की मिसाल बताते हुए कहा कि आयोजन के बाद सभी योद्धा एक-दूसरे से गले मिलते हैं।

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