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देहरादून में नवम घुघुति महोत्सव: हिमालयी संस्कृति, लोकसंगीत और सामाजिक चेतना का भव्य संगम

देहरादून:
प्राउड पहाड़ी सोसाइटी द्वारा आयोजित नवम घुघुति महोत्सव में पूरे पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत मानो धरती पर उतर आई। गढ़वाल, कुमाऊँ, जौनसार, तिब्बत और हिमाचल की समृद्ध परंपराओं को एक मंच पर संजोते हुए यह सांस्कृतिक संध्या उत्साह, लोकगौरव और सामाजिक चेतना के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुई।

कार्यक्रम में गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी, गोरखाली और तिब्बती नृत्य दलों ने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पारंपरिक वेशभूषा, लोकसंगीत और नृत्य की विविध छटाओं ने हिमालयी संस्कृति की जीवंत झलक पेश की।
वहीं टीम देवस्थली बैंड ने अपने लोकगायन से पूरे सभागार को सुरों की मधुर धारा में डुबो दिया।

इस अवसर पर प्राउड पहाड़ी सोसाइटी ने हिमालय क्षेत्र के संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और सामाजिक सरोकारों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों एवं संस्थाओं को “प्राइड ऑफ हिमालयाज” सम्मान से सम्मानित किया।
सम्मान पाने वालों में शामिल रहे:

  • सेनानिवृत्त कर्नल अजय कोठियाल
  • जे.पी. मैठाणी (आगाज फेडरेशन)
  • ईको टास्क फोर्स
  • थर्ड पोल लाइव
  • लूशून टोडरिया
  • सांस्कृतिक गायन समूह देवस्थली

महोत्सव की थीम “संस्कृति से संभावना तक” पर आयोजित परिचर्चा में समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों ने हिमालयी क्षेत्रों में संस्कृति आधारित स्वरोज़गार, स्थानीय अवसरों और सतत विकास पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि लोकसंस्कृति केवल पहचान ही नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण का भी मजबूत माध्यम बन सकती है।

महोत्सव के दौरान विभिन्न स्थानीय उत्पादों के स्टॉल लगाए गए, जिनमें स्वयं सहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी रही। इससे खासकर महिलाओं को अपने हस्तनिर्मित और पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित व विक्रय करने का अवसर मिला।

प्राउड पहाड़ी सोसाइटी के अध्यक्ष गौरव बिष्ट ने कहा कि संस्था हर वर्ष ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से पहाड़ी पहचान, लोकसंस्कृति और हिमालय संरक्षण के लिए निरंतर कार्य करती रहेगी।

इस सफल आयोजन में संयोजक टीम — सुमित थपलियाल, अंकिता रावत, विनीत कोहली, हृदयेश शाही, शिवम भंडारी — तथा पूरी प्राउड पहाड़ी टीम का विशेष योगदान रहा।

नवम घुघुति महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हिमालयी अस्मिता, लोकपरंपराओं और सामुदायिक एकजुटता का जीवंत उत्सव बनकर उभरा।

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