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लचीले कानून की सजा भुगत रही उत्तराखंड की जनता ,सरकार कर रही है इंतज़ार अनहोनी की

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आमतौर पर नियम-कायदे ऐसे होने चाहिए कि गड़बड़ी की आशंका मात्र में ही संबंधित के खिलाफ वो कार्रवाई की जा सके, जिससे पब्लिक को कोई नुकसान न पहुंचे। जब बात सेहत से जुड़ी हो तो नियमों को और सख्त होना चाहिए। लेकिन, खाद्य सुरक्षा विभाग में उल्टी गंगा बह रही है। यहां नियम-कायदे ही जनता को ‘जहर’ खाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं मिलवाटखोरी की। जिस पर खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारी चाहकर भी तत्कालिक कार्रवाई नहीं कर पा रहे। लचीले नियमों के चलते सिर्फ सैंपलिंग कर मिलावटी खाद्य पदार्थो को छोड़ा जा रहा है।

ऐसा ही निरंजनपुर मंडी में पकड़े गए 11 क्विंटल मावे के साथ भी हुआ। पुलिस ने यह मावा मिलावटी होने की आशंका में पकड़ा था। खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने भी इसके मिलावटी होने की आशंका जताई। लेकिन, नियमों के बंधन में बंधे अधिकारियों को यह मावा सिर्फ सैंपल लेकर छोड़ना पड़ा।

इस बाबत पूछे जाने पर खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम में शक के आधार पर पकड़े गए किसी भी पदार्थ को मौके पर नष्ट करने का प्रावधान नहीं है। प्रयोगशाला से इसकी रिपोर्ट आने पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। जिसमें तकरीबन डेढ़ माह का समय लगेगा। यानी कि रिपोर्ट आने तक यह मावा किसी न किसी रूप में जनता के हलक के नीचे उतर चुका होगा। इसके बाद मिलावट साबित भी हुई तो क्या? ज्यादा से ज्यादा विभाग व्यापारी पर मुकदमा दर्ज करा देगा।

इस वजह से मौके पर नहीं करते नष्ट

खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारी मिलावट की आशंका के बाद भी किसी पदार्थ को सिर्फ इसलिए नष्ट नहीं कराते कि कहीं प्रयोगशाला में उसका सैंपल पास हो गया तो उसकी भरपाई कैसे करेंगे। खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों की मानें तो कुछ समय पहले एक पनीर का सैंपल लिया गया है।

सैंपल लेने के बाद पनीर को नष्ट करवा दिया गया। बाद में सैंपल रिपोर्ट पॉजिटिव पाई गई। जिस व्यापारी का पनीर नष्ट किया गया था, उसने विभाग के अधिकारियों पर पनीर का क्लेम कर दिया। बाद में यह केस कोर्ट में भी पहुंच गया।

सोबन सिंह गुसांई

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