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मेरीनो भेड़ की पहली खेप पहुंची उत्तराखंड कि ऊन को आस्ट्रेलिया की कोमलता बनाने को

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आस्ट्रेलिया की विश्वविख्यात कोमल, बारीक, मजबूत और लचीली मेरीनो ऊन का उत्पादन अब उत्तराखंड में भी मुमकिन होगा। आस्ट्रेलियाई प्रजाति के इन भेड़ों की पहली खेप उत्तराखंड पहुंच गई हैं। जल्द ही इन्हें पर्वतीय जिलों में वितरित किया जाएगा। भारतीय भेड़ की तुलना में तीन गुना अधिक ऊन देने वाली इन भेड़ से पिछड़ रहे उत्तराखंड के ऊन उद्योग को संजीवनी मिलने की उम्मीद है।

उत्तराखंड के पर्वतीय जनपद पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी में सर्दियों से ऊन का उत्पादन होता रहा है। ऊन के लिए हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोग भेड़ पालते हैं। इनसे निकलने वाली ऊन स्थानीय हस्तशिल्प में उपयोग होने के साथ ही देश के बड़े शहरों में भी भेजी जाती रही है। पिछले कुछ वर्षो में हिमालयी भेड़ों की ऊन देने की क्षमता गिरने से लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। इसे  देखते हुए सरकार ने दुनिया में ऊन उत्पादन में अग्रणी आस्ट्रेलिया से मेरिनो प्रजाति की भेड़ मंगाई हैं।

राज्य को मिली भेड़ों की पहली खेप फिलहाल टिहरी जनपद स्थित पशुपालन विभाग के कोपड़धार फार्म में रखी गई हैं, जहां ब्रीडिंग के बाद इन्हें अन्य पर्वतीय जनपदों को उपलब्ध कराया जाएगा। पहले चरण में 240 भेड़ आस्ट्रेलिया से मंगाई गई हैं, जिनमें 200 मादा तथा 40 नर हैं। सरकार ने इस पर साढ़े आठ करोड़ की धनराशि खर्च की है।

आस्ट्रेलियन प्रजाति की मेरिनो भारतीय भेड़ों की तुलना में तीन गुना अधिक ऊन देती हैं। भारतीय भेड़ों से साल में जहां से दो से ढाई किलो तक ऊन मिलता है, वहीं मेरिनो छह किलो से अधिक ऊन देती है। गुणवत्ता में भी यह बेहतर है। उत्तराखंड में इन भेड़ों का प्रसार होने के बाद पशुपालकों की आजीविका बेहतर होने की उम्मीद है। सीमांत जिला पिथौरागढ़ में वर्तमान में 45000 भेड़ हैं, जिनसे सालाना 900 क्विंटल ऊन उत्पादित होता है। यह ऊन काशीपुर, लुधियाना आदि शहरों में भेजा जाता है।

डॉ. पंकज जोशी नोडल अधिकारी ऊन बोर्ड उत्तराखंड ने बताया कि आस्ट्रेलियन प्रजाति की मेरिनो भेड़ उत्तराखंड पहुंच गई हैं। फिलहाल इन्हें टिहरी जनपद के कोपड़धार फार्म में रखा गया है। जल्द इन्हें भेड़ पालक जनपदों को वितरित किया जाएगा। मेरिनो भेड़ के प्रसार से राज्य में ऊन उत्पादन बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

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