उत्तराखंड सरकार ने दिखाई राह तो मातृशक्ति में जागा गजब का आत्मविश्वास, स्वावलंबन को बढ़ रहे कदम

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आजादी के सात दशक बाद भी गांवों के हालात उस हिसाब से नहीं बदल पाए जैसी अपेक्षा रही। खासतौर पर मातृशक्ति यहां आज भी चूल्हे या चैखट से बाहर नहीं निकल पाई है। अपवादों को छोड़ यहां खेतीबाड़ी और घरेलू कामों में ही जिंदगी घिसट कर गई है। लेकिन हाल में प्रदेश सरकार की ओर से जो प्रयास हुए हैं उनमें बेहतरी की उम्मीद की जानी चाहिए। सरकार की ओर से चली स्वावलंबन की योजना ने यहां बड़ी तादाद में मातृशक्ति का आत्मविश्वास बढ़ाया है। कई महिलाएं स्वालंबन की दिशा में भी बढ़ रही हैं। ऐसे में तो जरूर इन प्रयासांे की सराहना की जानी चाहिए।

जनपद पौड़ी के अंतर्गत नौडियाल गांव की प्रमिला देवी, सरिता देवी, संगीता, अगरोड़ा की सुनीता, निशा, अनीता, हाचुई की पूजा, कोलड़ी की शकुंतला देवी, अंबिका राजेश्वरी, बंूगा की रश्मि बिष्ट,देवा देवी, प्रमिला देवी, गीता यह कफोलस्यूं और पैडुलस्यूं की वह महिला टीम है जिन्होंने अपने हुनर का उपयोग दूसरों को स्वालंबी बनाने के लिए किया। सिलाई में पारंगत इन महिलाओें ने क्षेत्र की करीब तीन सौ से अधिक महिलाओं को सिलाई के काम में दक्ष कर दिया है। बता दें कि इससे पूर्व पूरे क्षेत्र में गिनती की ही महिलाएं थी जो या तो पहले से प्रशिक्षण हासिल कर किसी काम में दक्ष थी। लेकिन गांवों में ज्यादातर महिलाओं दिनचर्या चूल्हा चैके तक ही सिमटी हुई थी। और जो प्रशिक्षित थी भी उनका हुनर भी उसी चूल्हे चैके में पिस कर रह गया था।

लेकिन हाल के वर्ष में प्रदेश सरकार के श्रम विभाग ने महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए जो योजना संचालित की, उसने गांवों की फिजा ही बदल कर रख दी है। गांव घरों में सिलाई का प्रशिक्षण प्राप्त कर मातृशक्ति में गजब का आत्मविश्वास जागा है।
यहां करीब 300 से अधिक महिलाओं ने कोरोना के लाॅकडाउन से पहले ही प्रशिक्षण ले लिया था। और कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जब मास्क की जरूरत पड़ी तो मातृशक्ति के प्रशिक्षण और आत्मविश्वास की भी परीक्षा हो गई। जिसमें उनका प्रदर्शन उम्मीदों से अधिक रहा। ग्रामीण महिलाओं ने बड़ी तादाद में मास्क बनाए। और लाॅकडाउन काल में भी अच्छा पैसा कमाया। यानी मातृशक्ति के प्रदर्शन ने योजना को सफलता का प्रमाण पत्र भी हाथों हाथ दे दिया। प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं का आत्मविश्वास अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ है। अब वह सिलाई के साथ ही किसी भी काम को हौसले के साथ अंजाम दे सकती हैं।

क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत मोहन बिष्ट ने बताया कि क्षेत्र में अभी तक 18 शिविर लगाए जा चुके हैं। एक बैच मे ं24 महिलाओं का प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें प्रशिक्षण का भी सामान सरकार की ओर से दिया गया। और इंसेटिव भी दिया गया। अब वह स्वालंबन की दिशा में धीरे धीरे ही सही लेकिन आगे बढ़ रही हैं। वह कहते हैं त्रिवेंद्र सरकार ने कल्याणकारी योजना बनाई और श्रम मंत्री डा हरक सिंह रावत ने इसे गंभीरता से लिया है। नतीजा यह हुआ कि अब अन्य गांवों से भी मातृशक्ति को प्रशिक्षण देने की मांग जोरों से उठ रही हैं। जानकारों का कहना है कि पहाड़ के गांवों को स्वावलंबी बनाने के लिए ऐसे ही प्रयासों की जरूरत है। त्रिवेंद्र सरकार के यह प्रयास किताबी नहीं जमीनी हैं।