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तीरथ सरकार अब फ्रंट फुट पर बैटिंग को उतर आए; जाने पूरी खबर

सरकार के मुखिया तीरथ सिंह रावत अब फ्रंट फुट पर बैटिंग को उतर आए हैं। पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह एवं भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से औपचारिक मुलाकात और अब अफसरों की हाईलेवल टीम के साथ दर्जनभर केंद्रीय मंत्रियों से मिलने को फिर दिल्ली दरबार में दस्तक। साफ है, तीरथ केंद्र से सूबे के लिए ज्यादा से ज्यादा मदद हासिल करने के लिए डबल इंजन का असल दम आजमाने की उम्मीदें संजोए हुए हैं। ऐसा होना लाजिमी भी है, उत्तराखंड में चंद महीने बाद ही विधानसभा चुनाव जो हैं। ऐसे में केंद्र सरकार भी खुले हाथ मदद से गुरेज नहीं करेगी। तीरथ को सरकार की कमान तब मिली, जब चुनाव को बस सालभर का ही समय बचा था। उस पर कोरोना की दूसरी लहर से निबटने में दो महीने यूं ही निकल गए। अब हालात कुछ नियंत्रित हैं, तो तीरथ कमर कस मैदान में उतर आए हैं।

यूं तो राजनीति में देख कर नजरअंदाज करना मामूली बात है, मगर कभी ऐसा भी होता है कि बगल में बैठे अपने ही पार्टी के विधायक को मंत्री पहचान ही न पाएं। दरअसल, ऐसा मनमुटाव की वजह से मंत्री ने जानबूझकर नहीं किया, बल्कि बगल में बैठे विधायक चेहरे पर मास्क और सिर पर टोपी पहने हुए थे, लिहाजा मंत्री समझ ही नहीं पाए कि बगल में बैठा बंदा अपना ही विधायक है। यह वाकया कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के साथ घटित हुआ, जिसे बयां भी उन्होंने खुद ही किया। हरक सिंह रावत मुख्यमंत्री से मुलाकात को पहुंचे थे, वहीं विधायक खजानदास भी मौजूद। मंत्री को देख शिष्टाचार के नाते उनसे दुआ सलाम कर बगल में आ बैठे, लेकिन मंत्री तो जैसे अनजान बन गए। वह तो जब विधायक ने बातचीत शुरू की, तब हरक को समझ आया कि यह तो पार्टी विधायक हैं। यह है मास्क की माया।

चुनाव नजदीक, तो कांग्रेस भी सत्ता में वापसी को ताल ठोक रही है। कांग्रेस आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चिंता का सबब यह है कि उत्तराखंड में 2017 में 70 में से केवल 11 सीटों पर जीत दर्ज पाई कांग्रेस के क्षत्रप सबक लेने को कतई तैयार नहीं। वैसे तो यह कांग्रेस की सर्वव्यापी समस्या है, मगर यहां मामला कुछ ज्यादा दिलचस्प है। राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लगातार चुनावी चेहरा घोषित करने की पैरवी कर रहे हैं। मजेदार यह कि अब तक हुए चार विधानसभा चुनाव में वही हमेशा कांग्रेस का चुनावी चेहरा रहे हैं। यह बात दीगर है कि 2002 में नारायण दत्त तिवारी और 2012 में विजय बहुगुणा उन पर भारी पड़े। अलबत्ता, बहुगुणा की 2014 में विदाई हुई तो आलाकमान ने उनकी हसरत पूरी कर दी। रावत की डिमांड इस दफा भी, मगर पार्टी ने सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लडऩे का फैसला किया है।

मार्च में मुख्यमंत्री पद से हटाए गए त्रिवेंद्र सिंह रावत का पुनर्वास दिल्ली में होने जा रहा है, इंटरनेट मीडिया में चर्चा है। जैसा अमूमन होता है, ऐसे मामलों में पूर्व मुख्यमंत्री को संगठन में एडजस्ट किया जाता है, लेकिन कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र को केंद्रीय मंत्रिमंडल के संभावित विस्तार में मौका मिल सकता है। पांच लोकसभा सीटों के उत्तराखंड में निशंक पहले ही मोदी कैबिनेट का हिस्सा हैं, अगर त्रिवेंद्र को भी मौका मिलता है तो सूबे के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है। छह-सात महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं, मैसेज भी बढिय़ा जाएगा। इससे पहले वाजपेयी सरकार में बीसी खंडूड़ी और बची सिंह रावत, उत्तराखंड के हिस्से दो-दो मंत्री रहे हैं। ऐसा हुआ तो अहम सवाल यह कि क्या त्रिवेंद्र अपने उत्तराधिकारी तीरथ की सीट से लोकसभा जाएंगे। फिर तो तीरथ के लिए विधायक बनने को त्रिवेंद्र की डोईवाला सीट का विकल्प भी खुल जाएगा।

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