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हरियाणा में प्रदेश महामंत्री संगठन पद पर रहे सुरेश भट्ट की नैनीताल जिले में मौजूदगी ने कई नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी

हरियाणा में प्रदेश महामंत्री संगठन पद पर रहे सुरेश भट्ट की नैनीताल जिले में मौजूदगी ने कई नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। उनकी अलग-अलग सीटों से चुनाव लड़ने की चर्चाएं हैं। इसमें जिले की तीन सीटें मुख्य हैं। वैसे उनका घर कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में है। इसलिए सर्वाधिक चर्चा इस सीट की है। अभी पार्टी की ओर से इस तरह का कुछ भी संकेत नहीं हैं, लेकिन टिकट की दावेदारी की जुगत में जुटे नेताओं के लिए यह चर्चा बेचैनी ही बढ़ा रही है।भाजपा प्रदेश महामंत्री सुरेश भट्ट का बैकग्राउंड आरएसएस से है। उनका अधिकांश सामाजिक जीवन राज्य के बाहर ही बीता है। खासकर हरियाणा में। वह लंबे समय तक हरियाणा में प्रदेश महामंत्री संगठन पद पर रहे। वहां पर भट्ट की राजनीति में अच्छा-खासा दखल था। हरियाणा में उसका प्रभाव भी दिखने को मिलता था। लेकिन पिछले दो वर्ष से वह राज्य की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। उनका घर कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र के कालाढूंगी में है। कुछ समय पहले तक वह छोटी-छोटी सभाओं के जरिए अपनी मौजूदगी का एहसास भी करा रहे थे। इसके साथ ही पार्टी ने उन्हें सल्ट विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी दी थी। पार्टी गतिविधियों में कई जगह सक्रिय हैं।

जहां तक विधानसभा चुनाव 2022 की बात है। कालाढूंगी क्षेत्र में उनका घर होने की वजह से उनके इस सीट पर चुनाव लड़ने की सर्वाधिक चर्चा है।  यह आसान भी नहीं होगा। क्योंकि इस सीट पर भाजपा के कद्दावर नेता व कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत का वर्चस्व है। वह 70 वर्ष में भी अपने क्षेत्र में दमदार उपस्थिति बनाए हुए हैं। इसलिए अभी स्पष्ट कुछ कहना मुश्किल है। दूसरी सीट लालकुआं है, जहां पर भट्ट के चुनाव लड़ने की चर्चा सामने आ रही है। फिलहाल वहां पर सिटिंग विधायक नवीन दुम्का के अलावा भाजपा जिलाध्यक्ष प्रदीप बिष्ट व पूर्व दर्जा राज्य मंत्री हेमंत द्विवेदी को भी टिकट मिलने की उम्मीद है। तीसरी विधानसभा सीट भीमताल है। जहां दावेदार तो कई हैं, लेकिन कोई बड़ा नाम खुलकर उभरकर सामने नहीं आया है। माना जा रहा है कि अगर सभी समीकरण ठीक रहे तो पार्टी भट्ट को वहां से चुनावी मैदान में खड़ा कर सकती है। कार्यकर्ताओं के बीच इस बात की भी कानाफूसी है। भट्ट को लेकर हो रही इस तरह की सियासी चर्चा ने तीनों विधानसभा क्षेत्रों के कद्दावर नेता व दावेदारी की इच्छा जताने वालों की बेचैनी बढ़ा दी है। भले ही इस बात को खुलकर कोई बोलने को तैयार नहीं है, लेकिन राजनीतिक हलकों में हो रही इस तरह की चर्चा के कई मायने निकाले जा रहे हैं। इससे दावेदारों की बेचैनी बढ़ना भी स्वाभाविक ही है।

 

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