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लंबे इंतजार के बाद बारिश और बर्फबारी के रूप में बरसी नेमत के बाद जंगलों की बुझी आग

उत्तराखंड में सर्दियों में सुलग रहे जंगलों पर आखिरकार इंद्रदेव को तरस आ ही गया। लंबे इंतजार के बाद बारिश और बर्फबारी के रूप में बरसी नेमत के बाद जंगलों की आग बुझी है। जाहिर है कि इससे वन महकमे को भी फिलवक्त बड़ी राहत मिल गई है। हालांकि, इसे लेकर बहुत अधिक खुशफहमी पालने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, असल परीक्षा का वक्त तो अब आने वाला है। आने वाले दिनों में पारा चढ़ने से जंगलों में आग का खतरा अधिक बढ़ जाएगा। वैसे भी 15 फरवरी से मानसून के आगमन तक के वक्त को जंगल की आग के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। जाहिर है कि जंगल आग से महफूज रहें, इसके लिए वन महकमे को सर्दियों की आग से सबक लेते हुए नई रणनीति के साथ कदम उठाने होंगे। जनसहयोग लेने के साथ ही संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता पर खास फोकस करने की जरूरत है।

सालाना तीन लाख करोड़ रुपये की पर्यावरणीय सेवाएं देने वाले उत्तराखंड में अब पर्यावरण संरक्षण की मुहिम तो तेज होगी ही, जंगलों से स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार का रास्ता भी अब साफ हो गया है। यह संभव हो पाया है केंद्र की ओर से दी गई राहत के बूते। प्रतिकरात्मक वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैंपा) में राज्य को 140 करोड़ का अतिरिक्त बजट देने पर केंद्र ने सहमति दे दी है। इस राशि का उपयोग वन विभाग के माध्यम से वनों के संरक्षण-संवर्द्धन के मद्देनजर 10 हजार वन प्रहरियों की तैनाती के अलावा क्षतिपूरक वनीकरण के लक्ष्यों की पूर्ति, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम जैसे कार्यों में किया जाएगा। जाहिर है कि इससे पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। गेंद अब राज्य सरकार के पाले में है। योजनाएं सही ढंग से धरातल पर फलीभूत हों, इस दिशा में ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

उत्तराखंड में गुलदार और हाथी पहले ही जनसामान्य के लिए मुसीबत बने हैं और अब इस पांत में भालू भी शामिल हो गया है। सर्दियों में भालू के बढ़ते हमले इसकी तस्दीक कर रहे हैं। असल में सर्दियां शुरू होते ही भालू गुफाओं में शीत निंद्रा में चले जाते हैं। सूरतेहाल, शीतकाल को भालू के हमलों के लिहाज से सुरक्षित माना जाता है। अलबत्ता, इस मर्तबा स्थिति बदली-बदली सी है। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में सर्दियों में भी आबादी वाले इलाकों में भालुओं की न सिर्फ सक्रियता बनी हुई है, बल्कि ये निरंतर हमले भी कर रहे हैं। ऐसे में चिंता बढ़ गई है। हालांकि, वन्यजीव महकमे ने जानकारी जुटाई तो प्रथम दृष्ट्या कारण सामने आया कि भालुओं की शीत निंद्रा में खलल पड़ा है। इससे वे आक्रामक हो रहे हैं। हालांकि, अब इस संबंध में अध्ययन कराया जा रहा है। इसके बाद ही कारणों की सही तस्वीर सामने आएगी।

राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघों का कुनबा बढ़ाने के मद्देनजर वहां कार्बेट टाइगर रिजर्व से बाघ शिफ्टिंग का फैसला सही साबित होने जा रहा है। राजाजी के मोतीचूर-धौलखंड क्षेत्र में शिफ्ट की गई बाघिन ‘रानी’ और बाघ ‘सुल्तान’ ने इस इलाके को अपना लिया है। बीती नौ जनवरी को शिफ्ट किए गए सुल्तान ने अपना आशियाना उस इलाके में बनाया है, जहां पिछले आठ साल से दो बाघिनें ही मौजूद हैं। इनमें से एक को सुल्तान ने अपने साथी के रूप में भी स्वीकार कर लिया है। ऐसे में वन्यजीव महकमे के अधिकारियों का मानना है कि मार्च आखिर अथवा अप्रैल की शुरुआत में यहां नन्हे मेहमान शावक आ सकते हैं। बाघिन का गर्भावस्थाकाल तीन माह का होता है। जाहिर है कि इससे मोतीचूर-धौलखंड में बाघों का कुनबा बढ़ेगा। यही, बाघों की शिफ्टिंग का मकसद भी है। अब जल्द ही दो मादा, एक नर बाघ को यहां शिफ्ट किया जाएगा।

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