चीन से लड़ने की तैयारी, लेकिन सीमा क्षेत्र में पक्के पुल तक नहीं

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चीनी सैनिकों के साथ हुई हिंसक झड़प में भारत के 20 सैनिकों की शहादत के बाद पूरा देश ग़म और गुस्से से उद्वेलित है। लोग अब चीन से सीधी लड़ाई लड़ने की वकालत भी करने लगे हैं। लेकिन युद्ध की संभावनाओं के बीच चीन की सीमा से लगे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों और पुलों पर नज़र डालें तो चिंताजनक तस्वीरें दिखाई देती हैं। सैनिक अमलों की आवाजाही के महत्त्वपूर्ण रास्तों पर आज भी पक्के पुल नहीं बन पाए हैं। सीमांत जनपद पिथौरागढ़ का ही अवलोकन करें तो यहां अब भी कई स्थानों पर लकड़ी के पुलों से काम चलाया जा रहा है। सामरिक और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण चीन सीमा से लगी जोहर घाटी के लास्पा गाड़ (गधेरा) पर पक्का पुल न होने के कारण भारतीय सेना के जवानों को जान-जोखिम में डालकर सीमा तक पहुंचना पड़ता है। इसी मार्ग से सेना की रसद सामग्री और हथियार सीमा पर पहुंचती है। यही नहीं, घाटी के नौ माइग्रेशन गांवों के लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

वर्तमान में पक्के पुल के अभाव में चीन से लगी भारतीय सीमा में लास्पा गाड़ के अस्थायी पुल से ही सैनिक और स्थानीय लोग आवाजाही करने को मजबूर हैं। लगातार हो रही बारिश और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण लास्पा गाड़ का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे ये अस्थायी पुल कभी भी बह सकता है। यहां हर साल बरसात में यह अस्थायी पुल ध्वस्त हो जाता है। यहां पर पक्का पुल के न होने से माइग्रेशन गांवों के ग्रामीणों के साथ-साथ भारतीय फौज और आईटीबीपी के जवान जान हथेली पर रखकर नदी पार करते हैं।
गौरतलब है कि इसी मार्ग से सेना रसद सामग्री और हथियार सीमा पर पहुंचाती है। यहां पर पुल के निर्माण को लेकर लोनिवि गंभीर नहीं है। इसका खामियाजा जोहार घाटी के गांव मिलम, बुर्फू, बिल्जू, टोला, लास्पा, मरतोली, पाछू, गनघर, मापा, ल्वागांव को भी भुगतना पड़ रहा है।

वर्ष 2019 में हुई भयानक बर्फबारी के कारण यहां पर पुल ध्वस्त हो गया था। इसके बाद यहां पर अस्थायी पुल का निर्माण किया गया था, लेकिन ये अस्थायी पुल अब पूरी तरह जर्जर हो गया है। इसके बाद भी यहां पर पक्के पुल का निर्माण नहीं किया गया। लोनिवि के जेई महेश कुमार का कहना है कि शीघ्र ही जर्जर पुल को ठीक कर लिया जाएगा।