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एक इंसान हूँ मैं तुम्हारी तरह

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हरिश्चंद्र श्रीवास्तव जी पूर्णतः दृष्टिहीन हैं। उनकी दवा के पर्चे पर देखकर मुझे पता चला कि उनकी उम्र ७० वर्ष है, अन्यथा मुझे तो ५५ ही लगती थी। और इसके बावज़ूद वो एक दृष्टिबाधित विद्यालय चलाते हैँ। जिसमें कभी ४० विद्यार्थी पढ़ा करते थे।

कई बार सोचा था आप लोगो से उनके विषय में बाँटने को, मगर कुछ न कुछ दूसरा आ जाता तो श्रीवास्तव जी पीछे रह जाते। ये तो मुझे भी नही याद आ रहा है कि किस तरह श्रीवास्तव जी से मुलाकात हुई। पर जब से हुई तब से दिमाग से उतरे नही वो। एक दुबला पतला शरीर। जिसे अपने रास्ते पर चलने के लिये किसी और से मार्गदर्शन लेना पड़ता हो, वो शख़्स ४० ऐसे बच्चो का मार्गदर्शन कर रहा है, जो अँधेरों में भटक रहे हैं।

मोहित, आकाश, विजेंद्र, जैसे जाने कितने बच्चे, जिनमे किसी के पिता ठेला लगाते हैं, किसी के फेरी, किसी के दिहाड़ी की मज़दूरी। उनके लिये किसी काम के नही है वो बच्चे। 7-8 की तादात में की गई उनकी वंशवृद्धि का रुतबा इस एक के होने से ज़रूर बिगड़ता है, ना होने से नही। जितने बच्चे होंगे, उतने हाथ कमाई कर के लायेंगे। मगर बदकिस्मती से हुए फाउल जैसी ऐसी संतान का वो करें क्या? ये ला कर तो कुछ ना देगी मगर इसे खिलाने में एक तो बिना रिटर्न का इनवेस्टममेंट दूसरे तीमारदारी में एक और व्यक्ति को लगने से दोहरा नुकसान…! ऐसे में जो बच्चा श्रीवास्तव जी के विद्यालय में आ जाता है उसे माँ बाप वापस ना ले जाने की ही पूरी कोशिश करते हैं।

विद्यालय मे पहुँचते ही बच्चों के चेहरे पर आई खुशी को देख कर आप को लगेगा कि हम कहाँ बिना मतलब की औपचारिक मुस्कानों में फँसे है। असली मुस्कान तो यहाँ बसी है।

“दीदी अबकी आप किस चीज से आई हो।… वो बंदूक आप राहुल को दे गईं थी, अबकी हमे देना।…बहुत बहुत दिन बाद आती हैं आप…अब कब आयेंगी.. १० दिन बाद आ जायेंगी..ठीक १० दिन बाद ना…!”

और मै झूठा वादा कर के आ जाती। १० दिन बाद कौन कहे महीनो नही जा पाती। श्रीवास्तव जी ने लगभग २ साल पहले बताया कि सरकारी सहायता जो थोड़ी बहुत मिलती थी,वो बंद हो गई, नई सरकार आने पर। अब तो रेगुलर डोनेटर्स का ही सहारा है। मैं आश्चर्य में पड़ जाती, रेगुलर डोनेटर्स के बल पर इतना बड़ा जिम्मा… और डोनेटर्स कितने रेगुलर हैं ये तो मैं खुद से ही जानती हूँ।

इसके बावज़ूद विद्यालय चलता रहा। बीच बीच में श्रीवास्तव जी की खबर ले ली जाती या वो खुद दे देते। “बस गवर्नमेंट एड फिर से मिलनी शुरु हो जाये, फिर सब ठीक हो जायेगा।” श्रीवास्तव जी विश्वास से कहते या फिर हम लोगो को विश्वास दिलाते।

अधिकतर मेरी समस्याओं के चलते वे किसी को आफिस भेज देते, अगर कोई काम होता। जुलाई तक की खबर थी, इस बार सोचा कि चलो चलके देख आते हैं बच्चों को। मैने श्रीवास्तव जी की लोकेशन जानने के लिये फोन मिलाया। तो फोन विद्यालय के एक लड़के वीरेंद्र ने उठाया जो देख सकता था। (दो ऐसे बच्चे जो गरीब घरों के हैं और देख सकते हैं वे इस विद्यालय में बाजार और दृष्टि से संबंधित काम करते हैं) और उसने बताया “मैम जी अब तो विद्यालय वहाँ नही रहा जहाँ था।”

आर्थिक सहयोग ना मिल पाने के कारण विद्यालय के पूर्व भवन का किराया नही दिया जा सकता था अतः घर बदलना पड़ा। खैर मैं पिंकू को ले कर फोन करके पता पूछते हुए वहाँ पहुँची। संस्था अब संकरी गलियों के बीच थी। एक बाउंड्री रहित घर…! जिसके छोटे से दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही बैठक कक्ष शुरु हो जाता है और वहीं बेड पर श्रीवास्तव जी पड़े थे। “कैसे है ?” का जवाब देने में ऐसा लगा कि उन्हे शरीर की पूरी ताकत लगा देनी पड़ी। वीरेंद्र ने बताया कि फेफड़ों में समस्या है। एक कंकाल पर पतला सा चमड़े का आवरण मात्र ही रह गया था शरीर के नाम पर….! पहले वाला भवन मेरे विद्यालय के पास ही था, तो मैं अकेले चली जाती थी। घर से पिंकू मेरे साथ पहली बार आया था। मैने देखा कि उसकी आँख में आँसू उमड़ रहे हैं और वो बार बार चेहरा घुमा ले रहा है।

वो पितृपक्ष के दिन थे। एक हाई प्रोफाईल दंपत्ति ने कमरे में प्रवेश किया। कल उनकी माता जी का श्राद्ध था और वो यहाँ खाना खिलाना चाह रही थीं। उन्होने ७०० रुपये का पेमेंट किया और मेन्यू पूछा आप क्या क्या खिलायेंगे ? वीरेंद्र ने बताना शुरु किया उससे पहले श्रीवास्तव जी ने हाँफती हुई आवाज़ में बताया।
“बस..? मिठाई नही” श्रीवास्तव जी के मेन्यू बताने के साथ ही उन्होने आश्चर्य से पूछा।
“आप कहेंगी तो मिठाई भी कर लेंगे।” वीरेंद्र ने कहा
“आपने तो चालीस बच्चे बताये है, यहाँ तो २८ हैं।”
” कुछ बच्चे सुबह पढ़ने आते हैं, विद्यालय में नही रुकते, मगर खाना तो उन्हे भी देना पड़ता है। फिर खाना बनाने जो आती हैं वो अम्मा। जो बर्तन झाड़ू पोंछा करती हैं वो और मैं और मोहित भी हैं।”
“ये लोग भी खायेंगे…! असल में हमे अपनी माँ का श्राद्ध करना है ना तो हम चाह रहे हैं कि खाना सही जगह पहुँचे।”
मेरा धैर्य जवाब दे रहा था। मगर शांत थी। ७०० रु में हम अपने घर में भी क्या इस मँहगाई के दौर में ४० लोगों को ठीक से भोजन करा सकते हैं ?

इसके बाद उन्होने प्रश्न किया “कितने बजे खिला देंगे”
“१०.००”
“फिर कितने बजे देते हैं कुछ खाने को ?”
“फिर ८.०० बजे रात में”
“इतना लंबा गैप?…बीच में कुछ भी नही…!”

मुझे शालीनता का लबादा ओढ़ कर बोलना पड़ा। “आप निश्चिंत रहें, आपकी माँ के श्राद्ध के लिये इससे बेहतर जगह और कोई नही हो सकती। और ये जो बच्चे हैं, ये अगर अपने घर में होते तो शायद चौबीस घंटे में एक बार भी ठीक से खाना ना नसीब होता इन्हे। यहाँ इस गैप के बाद मिल तो जा रहा है। आप सर की हालत तो देख ही रही हैं। ऐसा व्यक्ति इस संस्था को चला रहा है, गहराई से सोचिये तो बहुत आश्चर्यजनक है ये।”

उन्हे लगा कि मैं भी इस संस्था की सदस्य हूँ और हिकारत के साथ निगाह डालती हुई उन्होने कहा “आप भी यहीं रहती हैं।” श्रीवास्तव जी ने हाँफते हुए फिर से मेरा परिचय देने की कोशिश की मैने उन्हे रोकते हुए कहा ” नही मैं श्रीवास्तव जी की शुभचिंतक हूँ और इन्हे देखने आई हूँ।”

चलते समय मैने श्रीवास्तव जी से पूँछा “आप सरकारी सहायता के लिये प्रयास कर रहे थे ?”
उन्होने बहुत ताकत लगा कर निकली हाँफती हुई मगर आत्म विश्वास से भरी आवाज़ में कहा ” एक बार मुझे ठीक हो जाने दीजिये बस..”

हम लोग चले आये मैने सोचा था कि इस बार ३ दिसंबर को विकलांग दिवस पर मैं उन्ही के आत्मविश्वास की गाथा लिखूँगी और साथ में उनका फोटो भी….!!

मगर….! २६ नवंबर को जब मैं नेहा की शादी में व्यस्त थी तभी उनका नंबर स्क्रीन पर आया। फोन उठाने पर आवाज़ वीरेंद्र की मिली। हाल पूछने पर उसने कहा “मैम श्रीवास्तव जी ५ अक्टूबर को दुनियाँ छोड़ गये। संस्था बहुत अधिक फाइनेंशल प्रॉबलम से गुज़र रही है। आप मेम्बर बनवा देतीं रेगुलर डोनेशन वाले।”

शादी के उत्साह में थोड़ी देर के लिये हाथ पैर रुक गये। शांत हो कर सोचा ” शरीर का एक अंग कम होने से यदि जीवन इतने परिपूर्ण अर्थों में जी लिया जाये तो कमी अच्छी है। यदि वास्तव में मृत्यु के बाद लेखा जोखा ईश्वर के सामने खुल रहा होगा, तो जीवन भर कमियाँ झेल कर दूसरों की जिंदगी जीने के काबिल बनाने वाला ये व्यक्ति वहाँ के अमीरों में गिना जा रहा होगा।”

पुनःश्चः- तीन ३ दिसंबर को ये पोस्ट लिखने की सोची थी। मगर २ दिसंबर को शादी से वापस आने और आफिस मे कामो के चलते नही लिख सकी। देखा तो एक भी पोस्ट नही मिली विकलांग दिवस पर।एक घटना और बाँटती हूँ

दीदी के घर के लॉन में मैं बैठी थी तभी एक सज्जन और उनकी विवाहित बहन जीजाजी के पास किसी कोर्ट के केस के सिलसिले में आते हैं। आने के बाद उनकी पहली नज़र मेरे पैरों पर पड़ती है और मुझे कुछ अजीब सा भी लग सकता है, इसकी परवाह किये बगैर वो मेरे पैरों को घूरते रहते हैं। मैं दीदी को आवाज़ दे कर बुलाती हूँ और वो उन्हे जब बैठक में ले जाती हैं, तो मुझे लगता है कि मेरा दम घुटते घुटते अचानक साँस आ गई।

वो अंदर जा कर मेरे विषय में पूछते हैं। दीदी बताती है कि “मेरी बहन है। लखनऊ से आई है।”
वो पूरे करुणानिधान बन कर कहते हैं “बड़ा अच्छा है। इसी बहाने थोड़ा मन बहल जायेगा। अब तो शादी तक रहेगी।”
“नही..! शादी में फिर आयेगी। सर्विस करती है ना तो एक साथ इतनी छुट्टी नही मिलती।”
उनकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं “सर्विस करती है ?”
“हाँ…! केन डिपार्टमेंट में। सेंट्रल गवरमेंट का आफिस है।” जितनी आँखें चौड़ी हुई थी उतना ही दीदी के स्वर का उत्साह
“अच्छा..?? किस पद पर”
दीदी ने सगर्व बताया और साथ ही और भी बहुत कुछ जो उनके मन को मुझे ले कर खुश करता है, सेलरी भी बता दी गई। दीदी की हर बात के साथ उनका अच्छा कहने का तरीका बदलता रहा और हद तब हो गई जब वे उठ कर फिर से मुझे देखने बाहर लॉन में आ गये। इस बार निगाह पैर पर नही चेहरे पर थी…….।

मुझे जो नही मिला वो किस्मत से और जो मिला वो भी किस्मत से। सरकारी नौकरी तो तुक्के की बात है। व्यवस्थाएं इतनी आसान भी तो नहीं कि आसानी से सब कुछ मिल जाये। ना मिलता तो मेरी बुद्धि, मेरी भावना, मेरा व्यक्तित्व सब कुछ शून्य था। मिल गया तो किसी को ये जानने की जरूरत भी नही कि मैं मूलतः किस स्वभाव की हूँ।

सड़क पर बैसाखी लिये चिथड़ों में भागता व्यक्ति. पटरे पर पहिये लगा कर हाथ में चप्पल लिये सड़क पार करता किशोर, व्हीलचेयर पर पान मसाला बेचता युवक….. सब मेरे सामने थे….!! सब में मैं थी…मुझमे सब थे….!!!

by : कंचन सिंह चौहान

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