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ईगास स्पेशल : उत्तराखंड का पावन लोकपर्व ‘ईगास’ आज, सुबह गौ पूजा और शाम को खेलेंगे भैला,जानें इस पर्व की विशेषता

पींडा
पींडा जो ईगास के दिन मवेशियों को खिलाया जाता है

उत्तराखंड के पहाड़ों में बग्वाल यानि कि(दीपावली) के ठीक 11 दिन बाद इगास मनाई जाती है। इस दिन लक्ष्मी पूजन के साथ ही मवेशियों  की पूजा जाती है। और शाम को परंपरागत  रीति रिवाजों के साथ ‘भैला’ भी खेलते है. इस दिन मवेशियों के लिए झंगोरा का पींडू (पौष्टिक आहार) तैयार किया जाता है। उनका तिलक लगाकर फूलों की माला पहनाई जाती है। इसके बाद उन्हें ये आहार खिलाया जाता है।जब गाय-बैल पींडू खा लेते हैं

भैला का आनंद लेते हुए लोग

तब उनको चराने वाले या गाय-बैलों की सेवा करने वाले बच्चे को पुरस्कार दिया जाता है। इस दिन घरों में पूड़ी, स्वाले, उड़द की पकोड़ी  खीर आदि पकवान भी बनाये जाते हैं। रात को पूजन के बाद सभी भैलो खेलते हैं। इसके साथ ही एक महीने तक गावों में चलने वाला झुमैलो, थड़िया गीत का भी इस दिन समापन होता है। यहाँ के छोटे-बड़े महिला – पुरुष  सारे मिलकर पारम्परिक गीतों और लोकनृत्य के साथ भैला खेलकर इस त्यौहार का आनंद लेते है।

क्या है ईगास की विशेषता –

पारम्परिक तथ्यों और मान्यताओं के अनुसार बताया जाता है की गढ़वाल में भगवान राम के अयोध्या लौटने की सूचना 11 दिन बाद मिली थी। इसलिए यहां पर 11 दिन बाद यह पर्व मनाया जाता है। दूसरी मान्यता की बात करें तो दीपावली के समय गढ़वाल के वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट, तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी और दीपावली के ठीक 11वें दिन गढ़वाल सेना अपने घर पहुंची थी। युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दीपावली मनाई थी। हालाँकि इन तथ्यों में कितनी सच्चाई है। ये तो स्पष्ट करना बेहद ही कठिन है।  लेकिन यह प्रथा पहाड़ों में सदियों से चली आ रही है। जिसका लोग बेहद ही आंनद लेते है।

 

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