एक आईएएस ऐसे भी है जो नामुमकिन को मुमकिन बना देती है,विशेष रिपोर्ट

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कौन कहता है आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। यह पंक्ति सिर्फ कहने सुनने की नहीं बल्कि जीवन में उतार कर अमल में लाने का सूत्रवाक्य बन जाए तो नामुमकिन को मुमकिन होते देर नहीं लगती। चमोली की मौजूदा कलेक्टर अपनी सोच के चलते इसकी मिसाल हैं। उन्होंने अपनी कोशिशों से इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि फिलहाल दूर-दूर तक उसका कोई सानी नजर नहीं आता। शुरू में जिस काम को लोग बहुत हल्के में ले रहे थे, आज उनके कौशल से उपजे नतीजे को देख लोग दांतों तले अंगुली दबा रहे हैंं।स्कूल जाने से पहले निश्चित रूप से बच्चा मानसिक और शारीरिक तौर पर मजबूत नहीं होता, ऐसे में घर परिवार के बाद उसे बाहरी दुनियादारी का बोध करवाने के लिए आंगनबाड़ी जैसे केंद्र सर्वाधिक लाभकारी साबित होते हैं। हालांकि बड़े घरानों से ताल्लुक रखने वाले नौनिहालों को बड़े-बड़े नामी-गिरामी विद्यालयों से दुनियादारी की ए,बी,सी,डी, सिखाई जाती हैं किन्तु गरीब व मध्यम तबके के बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्र उन्हें बाहरी दुनिया की क,ख,ग,घ का पाठ पढ़ाने का वर्तमान में सब से महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। इन केंद्रों को सजाने संवारने का जिम्मा अगर कोई महत्वपूर्ण पद पर आसीन व्यक्ति स्वयं व्यक्तिगत रूप से उठा ले तो इन केंद्रों की ओर बच्चों के साथ ही उनके परिजन भी निश्चित रूप से आकर्षित होते है। जो कि वर्तमान में उत्तराखंड के सीमांत जिला चमोली में देखने को मिल रहा हैं। इस तरह के अभिनव प्रयास से आंगनबाड़ी केंद्रों की नई भूमिका सामने आ रही है।

आंगनबाड़ी केंद्रों के ऊपर अबोध बच्चों को शिक्षा का पहला आंखर, समाज में उठने, बैठने, अनुशासन को सिखाने की एक बड़ी एवं महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसके लिए यहां पर कार्य करने वालों को कड़ी मेहनत भी करनी पड़ती हैं। इसके लिए कार्य करने वालों को परिजनों के साथ ही सामाजिक सहयोग की भी अत्यंत आवश्यकता होती हैं। बिना इसके सफलता की उम्मीद करना पूरी तरह बेमानी ही होता है। उत्तराखंड में सीमांत चमोली जिले के दर्जनों आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों का बचपन निसंदेह कुछ अलग ही अंदाज में अंगड़ाई ले रहा है। जिले की पहली महिला कलेक्टर स्वाति एस भदौरिया बच्चों के बचपन को कुछ अलग ही अंदाज में आंगनबाड़ी केंद्रों में संवारने के प्रयासों में जुटी हुई हैं। शायद ही कभी किसी ने कल्पना भी की हो कि इस जिले के मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे व उनके परिजन मासूमों को दुनियादारी सिखाने के लिए इन केंद्रों की ओर रुख करने लगे हैं।

महिला कलेक्टर की इस अनोखी पहल के चलते कुछ ही समय में इस जिले के कई आंगनवाड़ी केंद्र नामचीन ब्रांड के प्ले स्कूल जैसे बन गये हैं। यह पहल दूसरे जिलों के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण बन गए हैं। इन केंद्रों की बाहरी दीवारों से लेकर आंतरिक साज-सज्जा और अन्य व्यवस्थाएं बच्चों की जरूरत और पसंद के लिहाज से तैयार की गयी हैं। दीवारों पर बच्चों के पसंदीदा कार्टून, आडियो किट, पंचतंत्र की कहानियां, बच्चों के बैठने के लिए रंग बिरंगी कुर्सियां, फलों के आकार की मेजें, खेलने के लिए झूले और खिलोनों के अलावा, एजुकेशन किट और स्वच्छता के लिए हाईजीन किट, वाटर फिल्टर और ट्रेक सूट पहने नौनिहालों के साथ संवाद करने वाली प्रशिक्षित सहायिकाएं यह आभास ही नहीं होने देती कि ये कोई सरकारी केंद्र हैं। इन आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों का भोजन बनाने के लिए जहां गैस की व्यवस्था है तो वहीं पेयजल, बिजली और शौचालय जैसी मूलभूत जरूरतों की भी व्यवस्था जुटाईं गईं हैं। केंद्रों मे बच्चों को गीत, कहानियों के माध्यम से सिखाने के लिए प्रोजेक्टर और लैटपटाप भी रखे गए हैं। स्वच्छता के साथ ही यहां पोषक आहार का भी पूरा ख्याल रखा गया है।तकरीबन दो साल पहले दस आंगनबाड़ी केंद्रों से शुरू हुए बचपन अभियान से अब जिले के 120 आंगनबाड़ी केंद्रों का कायाकल्प हो चुका है। आंगनबाड़ी में बचपन का यह रंग राज्य में कलेक्टर स्वाति भदौरिया का अभिनव प्रयोग है, जो व्यवस्था से ही नहीं बल्कि संवेदनाओं से भी जुड़ा है। आम धारणा जब यह बनती जा रही है कि नौकरशाह बेलगाम और संवेदनहीन हैं, ऐसे में राज्य के कुछ युवा नौकरशाह ऐसे भी हैं जो अपने नवाचार और संवेदनशीलता के चलते खासी लोकप्रिय बनी हुई हैं।

2012 बैच की आईएएस स्वाति की बतौर जिला कलेक्टर यह पहली पोस्टिंग है। इस दौरान स्वाति ने एक संवेदनशील और ईमानदार प्रशासक के तौर पर पहचान स्थापित की है। स्वाति भी दूसरे लोकप्रिय अफसरों की तरह एक जनसेवक होने की अपनी भूमिका के साथ न्याय करती हैं। आपदा जैसी दुख की घड़ी में वह खुद प्रभावितों के बीच पहुंचकर उनकी हिम्मत बढ़ाती हैं, तो स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में भोजन की गुणवत्ता जांचने के लिए खुद बच्चों के साथ भोजन करने बैठ जाती हैं। स्कूलों के औचक निरीक्षण, शिक्षा की गुणवत्ता एवं अन्य व्यवस्थाओं पर गौर करने के कारण व्यवस्थाएं खुद ब खुद सुधर रही हैं। निरीक्षण के दौरान बच्चों को अपना मोबाइल नंबर देना नही भूलती हैं। इसके अलावा बेसहारा लोगों को सहारा देना, प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना, जनता की समस्याओं को धैर्य से सुन उनका निदान करना उनकी कार्यशैली में शुमार हैं।तेलंगाना कैडर की पीपुल्स आफिसर यानी जनता की अधिकारी के नाम से मशहूर आईएएस अफसर स्मिता सभरवाल जो आइकन बन चुकी हैं।

अपनी कई सोचो के लिए पूरे देश में विख्यात हो चुकी हैं। उनके ही नक्शेकदम पर चलते हुए चमोली की कलेक्टर स्वाति एस भदौरिया भी अपनी नई सोच, विचार व प्रयोग के लिए राज्य में मशहूर होने लगी हैं। यूं तो आज नौकरशाही का जो रवैया है, उसमें कलेक्टर का पद सिर्फ हनक और पावर का प्रतीक बनकर रह गया है। राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ के चलते कलेक्टर की पोस्टिंग राजनैतिक हो चुकी है। पहले तो बिना सिफारिश के पोस्टिंग नहीं होती, और अगर होती भी है तो काम करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता लेकिन उत्तराखंड में चमोली की मौजूदा कलेक्टर इस मामले में सौभाग्यशाली हैं, कि उन्हें जिले को समझने और काम करने का पर्याप्त समय मिल रहा है।चमोली में स्वाति भदौरिया ने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाते हुए कई अभिनव प्रयोग शुरू किए, मगर बचपन उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है। आमतौर पर सरकार आंगनबाडी केंद्रों का संचालन बच्चों को कुपोषण से निजात दिलाने के लिए करती है लेकिन विडम्बना देखिए कि प्रदेश के अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र खुद ही कुपोषण का शिकार हैं, कई केंद्रों पर तो बच्चों के बैठने की व्यवस्था तक ठीक नहीं है। सरकारी महकमे संसाधनों के अभाव का रोना रोता है, मगर चमोली में कलेक्टर के प्रयासों ने आंगनबाड़ी के मायने ही बदल दिए हैं। यहां कलेक्टर की पहल पर बचपन, बेटर आंगनबाड़ी फॉर चाइल्डहुड प्रोग्रेस एंड नरिशमेंट नाम से माडल प्रोजेक्ट तैयार किया गया। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान के साथ बचपन को जोड़ते हुए ब्लाकवार आंगनबाड़ी केंद्रों का कायाकल्प किया जा रहा हैं। इन केंद्रों के लिए जिला प्रशिक्षण संस्थान से बाकायदा एक पाठयक्रम तैयार कराया गया। आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के साथ संवाद करने वाली सहायिकाओं को प्रशिक्षण दिलाया जा रहा हैं। धीरे-धीरे ये आंगनबाड़ी केंद्र एक प्रीस्कूल की तर्ज पर काम करने लगे हैं। इन केंद्रों में बच्चे ही नहीं उनके परिजन भी खुश हैं। केंद्रों पर बाकायदा पेरेंट्स टीचर मीटिंग आयोजित की जाती है।यही कारण है कि आज जिले के हर ब्लाक में करीब 120 आंगनबाड़ी केंद्रों में बचपन प्रोजेक्ट चल रहा है। जिले के एक हजार से अधिक बच्चे इन केंद्रों में हैं, दिलचस्प यह है कि कलेक्टर स्वाति खुद अपने तीन साल के बेटे को आंगनबाड़ी केंद्र भेजती हैं। बकौल स्वाति आंगनबाडिय़ों के प्रति सामान्य दृष्टिकोण बदलना चाहिए। यहां बच्चों के लिए समग्र वातावरण होना चाहिए।एक कलेक्टर के तौर पर स्वाति एस भदौरिया की रचनात्मक सोच साफ झलकती है। बचपन का एक आदर्श माडल तैयार करने के अलावा, चमोली मनरेगा में अव्वल है। केंद्र ने जिले को 23 लाख मानव दिवस पूरे करने का लक्ष्य दिया था। इसके सापेक्ष एक वर्ष में यहां साढ़े पच्चीस लाख मानव दिवस पूरे किए। एक ऑर अद्भुत प्रयोग देखिए, जिला मुख्यालय गोपश्वर में युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए प्रेरणा नाम से निशुल्क कोचिंग सेंटर संचालित किया जा रहा है।बदरीनाथ धाम में महिलाओं के समूहों द्वारा पंच प्रसाद की सफल योजना संचालित हो रही है। परंपरागत गौचर मेले में पिछले वर्ष कई अभिनव व सफल प्रयोग किए गऐ।माना जाता हैं कि अगर कलेक्टर सक्रिय और जनता से सीधा जुड़ा हो तो कई समस्याओं का निराकरण तत्काल हो सकता हैं इस धारणा को चमोली डीएम सच साबित करती दिख रही हैं।तभी तो गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत ने चमोली प्रशासन की मुस्तैदी से प्रभावित होकर कलेक्टर समेत उनकी पूरी टीम पर पुष्प वर्षा कर सम्मान कर चुके हैं। कोरोना के संकट काल में जिस दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कलेक्टर स्वाति ने मोर्चा संभालते हुए अब तक इससे निपटने के लिए कदम उठाए हैं, उसकी सर्वत्र सराहना की जा रही हैं। उन के द्वारा इस दौरान क्वारेंटन सेंटरों में की गई व्यवस्थाओं, लॉक डाउन का कठोरता से पालन करवाने के दौरान यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के पिता का कथित पित्रकर्म करने आने वाले बाहुबली विधायक अमरमणि त्रिपाठी को साथियों सहित बैरंग वापस लौटाना बड़े एवं निडरता से लिए गए फैसलों में गिना जा रहा है lऐसे वक्त में जबकि नौकरशाहों में संवेदनशीलता, सीपों के ढ़ेर में मोती चुनने जैसा है। ऐसे में स्वाति भदौरिया को जनता के बीच लोकप्रियता मिलना दूसरे अफसरों के लिए एक उम्मीद और प्रेरणा से कम नही होनी चाहिए। यह सच है जो भी जनता के दु:ख दर्द में सहभागी बनता हैं जनता भी उसके लिए पलक पावड़े बिछाने में कोई कंजूसी नहीं करती है।

( Uttarbharatlive से साभार )