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भाजपा सरकार में नेतृत्व परिवर्तन में हरदा कैसे रहें खामोश; जाने पूरी खबर

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सियासी गलियारों में हरदा के चर्चे न हों। अब भाजपा सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हुआ, भला हरदा कैसे खामोश रहें। हरदा, यानी पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत। हालांकि सूबे के सबसे उम्रदराज नेताओं में शुमार हैं, मगर उनकी हसरतें बदस्तूर जवां हैं। नेता बदलते ही जुमला उछाल दिया, टीएसआर-1 बनाम टीएसआर-2, मतलब त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत। हरदा बोले, पहले से दूसरे वाले रावत ज्यादा चालाक हैं। इसके कुछ कारण भी गिनाए। साथ ही तंज कसा, इस सरकार में अभी अल्टू-पल्टूराम हावी दिखाई दे रहे हैं। दरअसल, निशाने पर पांच साल पहले कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामने वाले पुराने मित्र थे, जो मंत्री हैं। मार्च 2016 में इनकी बदौलत हरदा की सरकार संकट में पड़ गई थी। अब वक्त तो काफी गुजर गया, मगर इनका दिया घाव भरने की बजाय अब भी टीस देता रहता है।

मिशन 2022, यानी, अगले विधानसभा चुनाव। भाजपा और कांग्रेस, दोनों इसे फतह करने को दिन-रात एक किए हैं। भाजपा सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हुआ तो कांग्रेस बल्लियों उछलने लगी। कारण भी वाजिब, उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद के 20 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुख्यमंत्री बदलने पर किसी पार्टी की सत्ता में वापसी हुई हो। भाजपा के भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद्र खंडूड़ी से लेकर कांग्रेस के हरीश रावत इसके उदाहरण हैं। पब्लिक है, सब जानती है, लिहाजा वोटर ने कभी अस्थिरता के पक्ष में जनादेश नहीं दिया। अबकी नंबर कांग्रेस का है तो खुश होना लाजिमी भी है, मगर पार्टी नेता यह बिसरा गए कि 2007 के विधानसभा चुनाव में भी सत्ता दगा दे गई थी, भले ही तब तिवारी पूरे पांच साल सरकार चला ले गए। यह बात दीगर है कि तिवारी सरकार के दौरान कांग्रेस के असंतुष्टों ने भी कमी नहीं छोड़ी थी।

सत्ता के गलियारों में दो हफ्ते पहले शुरू हुई हलचल अब भी हिलोरें ले रही है। मंत्रियों को महकमे बंट चुके, मगर अब सियासी सरगर्मी की दो वजह रहीं। एक तो नए मुखियाजी की युवा पीढ़ी के फैशन को लेकर की गई टिप्पणी और दूसरी कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की मुख्यमंत्री के लिए अपनी विधानसभा सीट छोडऩे की पेशकश। पहली वजह देशभर में खूब चर्चा बटोर चुकी, लिहाजा इसे दरकिनार कर बात करते हैं दूसरी की। हरक साढ़े तीन दशक के सियासी सफर में भाजपा से शुरुआत कर बसपा, कांग्रेस के रास्ते पांच साल पहले वापस घर लौट आए। मुख्यमंत्री के लिए अपनी कोटद्वार सीट छोडऩे की पेशकश कर उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे। पहला, क्या मालूम भाजपा आलाकमान उन्हें इसकी एवज में सांसद बना दे। दूसरे, मुख्यमंत्री के लिए कुर्बानी दी तो किसी फेमिली मेंबर को विधायकी तो मिल ही जाएगी। मतलब, दोनों हाथों में लड्डू।

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