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कांग्रेस सल्ट विधानसभा सीट के उप चुनाव में झोंके हुए पूरी ताकत

भाजपा और कांग्रेस सल्ट विधानसभा सीट के उप चुनाव में पूरी ताकत झोंके हुए हैं। दोनों दलों के दिग्गज चुनाव मैदान में जोर-आजमाइश में जुटे हैं, लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कोरोना से जंग लड़कर इन दिनों स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार हैं, तो उप चुनाव में सक्रिय न हो पाने की कसक हरदा को कुछ ज्यादा ही टीस दे रही है। इसका तोड़ उन्होंने इंटरनेट मीडिया में मार्मिक पोस्ट कर निकाला। दिलचस्प यह कि वह इन कठिन परिस्थितियों में भी अपनी ब्रांडिंग का कोई मौका चूक नहीं रहे हैं। हाल में उनकी एक पोस्ट ‘हरदा हमारा फिर आला’ खूब चर्चा में रही। मतलब, हरदा फिर वापस लौटेंगे। साथ ही जोड़ा, ‘मेरा भी हर सपना पूरा नहीं हुआ है।’ पार्टी को साफ संदेश, मुझे चुका हुआ मत मान लेना, मैं लौटूंगा।

उत्तराखंड को अलग राज्य बने 20 साल हो गए, मगर एक अजब सी मनहूसियत है, जो इसका पीछा नहीं छोड़ रही। छोटा सा सूबा, ज्यादातर पहाड़ी भूगोल, मगर सियासत इस कदर उठापटक वाली कि इस छोटे से वक्फे में ही 10 मुख्यमंत्रियों की ताजपोशी हो चुकी है। सही समझे, अस्थिरता का सूबे के साथ चोली-दामन सरीखा साथ बन गया है। अब तक भाजपा और कांग्रेस को दो-दो बार सरकार बनाने का मौका नसीब हुआ, मगर इनमें से केवल एनडी तिवारी ही एकमात्र मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने अपने कार्यकाल के पूरे पांच साल बिताए। मार्च 2017 में त्रिवेंद्र जिस तरह तीन-चौथाई बहुमत पाकर मुखिया बने, लगा इस बार एनडी के रिकार्ड की बराबरी हो जाएगी। मालूम नहीं, कहां चूक गए त्रिवेंद्र कि चार साल में ही विदाई हो गई। सत्ता के गलियारों में अब यह लखटकिया सवाल खूब चर्चा बटोर रहा है कि वह दिग्गज कौन होगा, जो पंचवर्षीय योजना पूरी करेगा।

सियासतदां हुए तो क्या हुआ, हैं तो आखिर इंसान ही। महीना ही गुजरा और इतने मसले कर दिए कि अब चुप रहना मुमकिन नहीं। चंद हफ्ते पहले सब कुछ अपने हाथ में था। क्या ये, क्या वे, सब हां में हां मिलाते दिखते थे। कुर्सी क्या गई, चारों तरफ आंखें तरेरने वाले इकट्ठा हो गए। ऐसा ही कुछ हाल है, हाल ही में पूर्व हुए मुखिया त्रिवेंद्र का। देवस्थानम बोर्ड बनाया, गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने का एलान किया, सब ताली पीट रहे थे, मगर वक्त ने पलटी खाई, सबको नागवार गुजर गया। अरे भाई, मुखिया ही तो बदला, सरकार तो अपनी ही पार्टी की है। ऐसा तो हरदा ने भी नहीं किया, जब बहुगुणा को उतार वह कुर्सी पर बैठे थे। चिंता यह खाए जा रही है कि जब एक महीने में इतना कुछ बदल डाला, तो अगले 10 महीनों में, चुनाव तक तो सब नया नवेला ही नजर आएगा।

सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हुआ, लेकिन एक को छोड़, बाकी सब मंत्री रिपीट हुए। अलबत्ता सीट खाली थीं, तो चार नई सवारी जरूर शामिल हो गईं। इनमें से दो को पहली दफा मौका मिला, तो दो पुराने धुरंधर। बंशीधर भगत भाजपा के पुराने दिग्गजों में शुमार हैं, पहले भी मंत्री रह चुके, मगर अब इन्होंने एक ऐसा फैसला कर डाला कि सब चौंक से गए। भगत ने अपने महकमे के एक कार्यक्रम में एक बड़ी घोषणा कर डाली, वाहवाही भी हुई लेकिन एक गड़बड़ हो गई। भगत भूल गए कि पानी के कनेक्शन को लेकर जो एलान उन्होंने किया, वह तो दूसरे के इलाके का मामला है। पानी वाले मंत्रीजी फिलहाल कुछ नहीं बोले, मगर बोलना तो पड़ेगा। बात यहीं खत्म नहीं होती। दूसरे कैबिनेट मंत्री ने एक कमेटी बनाने का फैसला किया और मुख्यमंत्री को इसका अध्यक्ष बना दिया। समझे आप, खैर अब मुखियाजी के रिएक्शन का इंतजार है।

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