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पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पांच दिनों से कुमाऊं मंडल दौरे पर

चार साल का कार्यकाल पूरा करने से महज एक हफ्ते पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत इन दिनों पूरे रंग में दिख रहे हैं। पांच दिनों से कुमाऊं मंडल का दौरा कर रहे हैं, इतना वक्त मुख्यमंत्री रहते मिलना मुमकिन था नहीं। त्रिवेंद्र की विदाई क्यों हुई, जवाब किसी के पास नहीं, मगर अब उन्होंने खुद इस सवाल का समाधान कर दिया। मीडिया से बोले, मैं चार साल में थक गया था, इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने ऊर्जावान चेहरे को नेतृत्व सौंप दिया। त्रिवेंद्र जी, पद से हटने के बाद आपकी सक्रियता से तो कतई नहीं लग रहा कि आप नेतृत्व करते थक गए थे। वैसे, बताया जा रहा है कि त्रिवेंद्र को भाजपा आलाकमान जल्द कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने जा रहा है। अब यह तो नहीं मालूम कि केंद्र सरकार या संगठन में, लेकिन उनकी मंद मुस्कान बता रही है कि एडजस्टमेंट मन के मुताबिक ही होगा।

तीरथ ने मार्च में मुख्यमंत्री का पद संभाला तो उनके सामने पहली बड़ी चुनौती हरिद्वार कुंभ के आयोजन की थी। फिर कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने सरकार को स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाने के मोर्चे पर लगा दिया। अब पिछले कुछ हफ्तों से कोरोना कुछ कंट्रोल में दिख रहा है तो तीरथ चुनावी मोड में आ गए हैं। सात-आठ महीने बाद जनता की अदालत में जाना है तो इससे ठीक पहले उन्होंने जनता मिलन की शुरुआत कर दी है, ताकि जन समस्याओं का निराकरण मौके पर ही किया जा सके। चुनाव में पार्टी कार्यकर्ताओं की ही भूमिका सबसे अहम रहती है, लिहाजा उनसे मुलाकात के लिए भी बाकायदा मुख्यमंत्री कार्यालय ने समय निर्धारित कर दिया है। जिलों के भ्रमण की शुरुआत मुख्यमंत्री पहले ही कर चुके हैं। दिलचस्प बात यह कि विधानसभा चुनाव से पहले तीरथ को 10 सितंबर तक खुद विधायक बनने के लिए उप चुनाव से भी गुजरना है।

सियासत भी अजब-गजब चीज है, कब क्या हो जाए, कोई अनुमान नहीं लगा सकता। कौन कह सकता था कि भाजपा आलाकमान विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले सूबे में दोहरा बदलाव कर डालेगा। सरकार के मुखिया त्रिवेंद्र को तो बदला ही, लगे हाथ संगठन की कमान भगत से लेकर कौशिक को सौंप दी। उधर, विपक्ष कांग्रेस में भी बदलाव की बयार बह रही है। कांग्रेस की दिग्गज और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के निधन से न केवल पार्टी में एक बड़ा शून्य बन गया, बल्कि पार्टी के संतुलन को भी इसने गड़बड़ा दिया। इंदिरा कांग्रेस की सूबे में एकमात्र ब्राह्मण विधायक थीं। उनका स्थान लेने को नाम तो कई हैं, मगर कद किसी का नहीं। प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, दोनों राजपूत हैं। कांग्रेस की चिंता यह है कि किस ब्राह्मण नेता को आगे बढ़ाया जाए। आखिर एक बड़े वोट बैंक का सवाल जो है।भाजपाइयों की उम्मीदें फिर हिलोरें ले रही हैं, क्योंकि कल ही मुख्यमंत्री तीरथ का बयान आया। तीरथ बोले कि एक हफ्ते में दायित्वधारियों पर फैसला हो जाएगा। दायित्वधारी, मतलब मंत्री के ओहदे के पद, जो सत्ता में रहते हर पार्टी बांटती है। पिछली त्रिवेंद्र सरकार के दायित्वधारी पैदल हो चुके हैं, तीरथ ने आते ही संवैधानिक पदों के अलावा सभी दायित्वधारी हटा जो दिए थे। दो-तीन वे दायित्वधारी भी बच गए थे, जिन्हें किसी एक्ट के तहत नियुक्त किया गया। ऐसे ही एक मामले ने पूरी भाजपा को असहज किया हुआ है। अब संकेत हैं कि ये दो-तीन भी जल्द रुखसत होने जा रहे हैं। अंदाज होगा कि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे। लब्बोलुआब यह कि अगले हफ्ते भाजपा के कई तलबगारों को मंत्री का ओहदा नसीब हो सकता है, लेकिन कुछ ऐसे भी रहेंगे, जिन्हें दायित्वों की दूसरी लहर में जोर का झटका जोर से लगेगा।

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