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प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम ने और केंद्रीय मंत्री व चुनाव प्रभारी प्रल्हाद पटेल ने धामी के नेतृत्व में ही चुनाव में जाने का एलान किया

पुष्कर सिंह धामी ने तीन महीने पहले उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। अभी सौ दिन भी पूरे नहीं किए हैं, मगर जिस कदर भाजपा के दिग्गजों का आशीर्वाद इन पर बरस रहा है, उतना किसी के हिस्से नहीं आया। 21 साल के उत्तराखंड में धामी अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री, जोश और जज्बा लाजिमी है, मगर कुर्सी संभालने के बाद जिस अंदाज में कदम बढ़ाए हैं, वह परिपक्वता को प्रदर्शित करता है। प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम ने सराहना की और फिर केंद्रीय मंत्री व चुनाव प्रभारी प्रल्हाद पटेल ने धामी के नेतृत्व में ही चुनाव में जाने का एलान किया। दो दिन पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले, धामी टी 20 क्रिकेट की तरह आखिरी ओवर के धाकड़ खिलाड़ी हैं। अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने एक वर्चुअल कार्यक्रम में धामी को मेहनती का खिताब देकर उनकी तारीफ की। बताइए, इससे ज्यादा कोई क्या चाहेगा।

विधानसभा चुनाव को बस तीन-चार महीने शेष हैं। भाजपा और कांग्रेस, दोनों सत्ता में आने का दावा कर रहे हैं। कौन कितने पानी में है, वक्त बताएगा, मगर कम से कम एक मोर्चे पर तो भाजपा अपनी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पर छह गुना भारी पड़ रही है। यह है पूर्व मुख्यमंत्रियों के तजुर्बे का लाभ। भाजपा और कांग्रेस लगभग बराबर समय सत्ता में रहे, मगर भाजपा ने इस दौरान दिए आठ मुख्यमंत्री और कांग्रेस ने तीन। इनमें से भाजपा के नित्यानंद स्वामी व कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी अब नहीं हैं। कांग्रेस सरकार के दौरान मुख्यमंत्री रहे विजय बहुगुणा अब भाजपा में हैं। पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम पर कांग्रेस के पास केवल हरीश रावत ही हैं। भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्रियों की सूची में भगत सिंह कोश्यारी से लेकर भुवन चंद्र खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक, त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत तक शामिल हैं। अब इतने दिग्गज, तो फायदा मिलेगा ही।

नेता ऐसे ही कामयाब नहीं बनते, एक्सपेरीमेंट और एक्सपीरियंस इसका मार्ग प्रशस्त करते हैं। विश्वास न हो तो कांग्रेस महासचिव और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को ही देख लीजिए। बतौर पंजाब प्रभारी रावत ने पार्टी का झगड़ा निबटाने के लिए वहां संगठन में पांच अध्यक्षों का प्रयोग किया, तो लगे हाथ यहां भी इस नुस्खे को आजमा डाला। बात यहीं नहीं थमी, उत्तराखंड में भाजपा ने चुनाव से छह महीने पहले मुख्यमंत्री बदला, तो रावत को लगा कि इस टोटके को पंजाब में भी अपनाना चाहिए। इस फेर में पंजाब के कैप्टन की कुर्सी चली गई। रावत के इन तेवरों से अब उत्तराखंड में कांग्रेस के वे नेता सकते में हैं, जो अगले विधानसभा चुनाव में रावत को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए जाने का विरोध करते रहे हैं। बात भी सही है, आखिर रावत ने मुख्यमंत्री बदल ही डाला, चाहे अपनी ही पार्टी की सरकार का मुख्यमंत्री बदला।

कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत अकसर चर्चा में रहते हैं। कभी अपनी ही पार्टी और सरकार से खफा हो जाते हैं तो नाराजगी छिपाते भी नहीं। प्रतिद्वंद्वी पर निशाना साधना हो तो ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कि कई दिन तक गूंज सुनाई देती रहे। हाल ही में मसूरी में एक कार्यक्रम में कुछ ऐसा बोल गए कि सरकार और संगठन असहज। राज्य के हालात पर भावावेश में आकर हरक मंच से बोल पड़े कि राज्य आंदोलन के शहीदों की आत्मा भी रोती होगी कि हमने नालायकों के हाथों में उत्तराखंड को सौंप दिया। हरक के बोल पर प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम से पूछा गया तो उन्होंने कहा, जैसे प्यारे बच्चे को डांटा जाता है, उसी तरह हरक सिंह को पार्टी डांटेगी। अब सत्ता के गलियारों में चटखारे लिए जा रहे हैं कि हरक तो सबसे ज्यादा सत्ता में रहे हैं, उत्तराखंड की चार में से तीन सरकारों में कैबिनेट मंत्री।

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