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राजनीतिक नफा-नुकसान के गणित ने नए वार्डों से हाउस टैक्स वसूलने के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है

राजनीतिक नफा-नुकसान के गणित ने नए वार्डों से हाउस टैक्स वसूलने के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए टैक्स माफ करने की घोषणा को चार माह बीत गए हैं, लेकिन अभी भी कई व्यावसायी टैक्स जमा कराने नगर निगम पहुंच रहे हैं। सीएम की घोषणा का हवाला देकर आती लक्ष्मी को लौटाया जा रहा है।

नगर निकायों को अपने खर्चों के लिए खुद ही संसाधन जुटाने होते हैं। निकायों की आय बढ़ाने की बात अक्सर उठती है, लेकिन अमल करने के मामले में राजनीतिक नफा-नुकसान आड़े आ जाता है। पिछले दिनों मुखानी निवासी एक व्यावसायी हाउस टैक्स जमा कराने निगम पहुंचे। स्व कर निर्धारण प्रपत्र भरकर पहुंचे व्यावसायी ने तीन हजार वर्ग फीट में फैले कांप्लेक्स का 25 हजार रुपये हाउस टैक्स जमा कराना चाहा। वह पिछली तिथि में टैक्स जमा कराने की गुहार लगाते रहे। निगम अधिकारियों ने टैक्स लेने से मना कर दिया।2018 में निकाय चुनाव से पहले टैक्स माफी की बात चली। निकायों के गठन के बाद जीओ आया घरेलू उपभोक्ताओं को दस साल तक टैक्स से राहत देने का। अप्रैल में पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को तीरथ सिंह ने रिप्लेस किया और सभी को टैक्स से राहत देने की घोषणा कर डाली।

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