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विधानसभा का बजट सत्र ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में; जाने पूरी खबर

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विधानसभा का बजट सत्र ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में हो रहा है। विपक्ष कांग्रेस के पास यूं तो भाजपा सरकार की सदन में घेराबंदी के लिए महंगाई, आपदा, कानून-व्यवस्था जैसे बड़े मुददे हैं, लेकिन पार्टी के रणनीतिकार परेशान बताए जा रहे हैं। वजह यह कि पिछले साल बजट सत्र के दौरान ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने विपक्ष और सत्तापक्ष को भी, चौंकाते हुए अप्रत्याशित तरीके से गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया था। गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग उत्तराखंड के अलग राज्य बनने से भी पहले की है। अब तक के सभी विधानसभा चुनाव में गैरसैंण बड़ा मुद्दा रहा, लेकिन त्रिवेंद्र ने इसे कांग्रेस के हाथों से छीन लिया। चर्चा है कि अब कांग्रेस इसलिए बेचैन है कि कहीं चुनावी वर्ष में मुख्यमंत्री बजट सत्र के दौरान इससे बड़ा कोई धमाका न कर दें। जिस तरह त्रिवेंद्र इन दिनों बैटिंग कर रहे हैं, कांग्रेस की चिंता गैरवाजिब नहीं।

पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी पुराने खिलाड़ी हैं, हालांकि पिछले चार सालों से ज्यादा सक्रियता नजर नहीं आई। अब अगले विधानसभा चुनाव की आहट महसूस होने लगी है तो एक्टिव हो गए। सीनियर हैं, हर हथकंडा जानते हैं चर्चा में आने का। कहा जाता है कि सत्तापक्ष में हों या विपक्ष में, अपने इलाके की हर सूचना इनके पास पहले पहुंच जाती है। दरअसल, शासन में चाहने वालों की कमी नहीं, लिहाजा जनता से जुड़ी कोई भी घोषणा हो या फैसला, इनके पास पक्की जानकारी होती है। आजकल नेताजी जिला प्राधिकरणों को खत्म करने के उद्देश्य से सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। दरअसल, सरकार भी जिला प्राधिकरणों से आम जनता को हो रही तकलीफ को देखते हुए इन्हें समाप्त करने या नियम शिथिल करने की तैयारी में है। नेताजी को भनक लगी तो सक्रिय हो गए, आखिर सियासत में श्रेय बड़ी चीज है।

वाह रे सियासत, जनता ने जिन नुमाइंदों को विधानसभा पहुंचाया, वे तो मंत्री की कुर्सी को तरस गए और बगैर चुनाव जीते 80 से ज्यादा मंत्री का ओहदा हासिल करने में कामयाब हो गए। दरअसल, मंत्रिमंडल में तीन सीट लंबे समय से खाली चल रही हैं, लेकिन तमाम चर्चाओं के बावजूद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अब तक अपने विधायकों की हसरत पूरी नहीं की। दिलचस्प यह कि मंत्रिमंडल में केवल नौ सदस्य हैं, लेकिन कैबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री का दर्जा 80 से ज्यादा पार्टी नेताओं को सरकार दे चुकी है। इन नेताओं को सरकार ने आयोगों, निगमों, समितियों, परिषदों में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पदों पर बिठाकर मंत्री के दर्जे से नवाजा है। अब तीन-चौथाई से ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में आए हैं, तो हिस्सेदारी तो उनकी भी बनती है, जिन्हें चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला। मजेदार यह कि किसी विधायक को मंत्री का दर्जा नहीं मिला।

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