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विधानसभा चुनाव में हार के परिणाम स्वरूप कांग्रेस की ओर से प्रदेश में की गईं नियुक्तियों को लेकर असंतोष गहरा गया

विधानसभा चुनाव में हार के परिणाम स्वरूप कांग्रेस की ओर से प्रदेश में की गईं नियुक्तियों को लेकर असंतोष गहरा गया है। पार्टी के निर्णय से नाराज आठ से दस विधायकों की गुपचुप बैठक और बागी सरीखे तेवर के बाद टूट की आशंका से पार्टी सहमी हुई है।हार का ठीकरा फोडऩे को लेकर पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और हाईकमान को निशाने पर ले चुके विधायक मदन सिंह बिष्ट की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई।विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी और रवि बहादुर ने दिल्ली में प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव से मुलाकात की। असंतुष्टों को मनाने के लिए पार्टी ने प्रयास तेज कर दिए हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने मंगलवार को देहरादून पहुंचकर प्रीतम सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की।

प्रदेश में पांचवीं विधानसभा चुनाव में हार की समीक्षा के बाद कांग्रेस ने तमाम कयासों को दरकिनार कर नए चेहरों पर दांव खेल दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर करन माहरा, नेता प्रतिपक्ष पद पर यशपाल आर्य और उपनेता प्रतिपक्ष के पद पर भुवन कापड़ी की नियुक्ति की गई है। इन नियुक्तियों में प्रदेश की कुल 70 में से 41 सीटों वाले गढ़वाल मंडल को प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका है।पार्टी का यही दांव अब असंतोष का बड़ा कारण बन रहा है। सिर्फ गढ़वाल ही नहीं, कुमाऊं मंडल में भी नाखुशी झलक रही है। दिग्गज नेताओं के साथ ही विधायकों की बड़ी संख्या भी इस निर्णय को पचा नहीं पा रही है।सर्वाधिक नाराजगी नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर दिखाई पड़ रही है। 2017 के चुनाव से पहले पार्टी छोड़कर गए पूर्व मंत्री यशपाल आर्य को पार्टी में वापसी करने के साथ ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से नवाजना विधायकों के साथ ही कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहा है। 19 में से करीब दस विधायक इस निर्णय से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं, तो इसका कारण भी है।

प्रीतम सिंह, मदन सिंह बिष्ट, राजेंद्र सिंह भंडारी, हरीश धामी, ममता राकेश समेत तकरीबन आधा दर्जन विधायक नेता प्रतिपक्ष पद के दावेदारों की कतार में थे। आर्य इस पद की दौड़ में शामिल माने जा रहे थे। उधर चमोली के बदरीनाथ से विधायक राजेंद्र भंडारी ने दिल्ली में प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव से मुलाकात कर गढ़वाल मंडल को पार्टी में प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का मुद्दा उठाया।

चुनाव से छह माह पहले वापसी करने वाले आर्य सबको पछाड़कर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पाने में सफल रहे। दावेदारों में इससे मायूसी छाई है। पार्टी के फैसले के विरोध में विधायकों ने गुपचुप ढंग से बैठकें तेज कर दी हैं। आशंका जताई जा रही है कि विधायक पार्टी का दामन छोड़ सकते हैं।

ऐसा हुआ तो 2016 के बाद यह पार्टी की बड़ी टूट हो सकती है। बताया ये भी जा रहा है कि कांग्रेस के कई विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। पार्टी के भीतर एक वर्ग विधायकों की नाराजगी को राष्ट्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाने की राजनीति के तौर पर देख रहा है।

पार्टी में असंतोष को लेकर हाईकमान भी सतर्क हो गया है। पार्टी के निर्देश को देखते हुए प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा के बाद नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य भी असंतोष प्रबंधन में जुट गए।

मंगलवार को हल्द्वानी से देहरादून पहुंचकर उन्होंने सबसे पहले पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और फिर शाम को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से मुलाकात की। आर्य ने प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल से भी मुलाकात की।

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