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१६ वर्षीय आकृति मुंडेपी बनी सबसे कम उम्र की गढ़वाली कवियत्री

जी, हां आकृति मुंडेपी गढ़वाली भाषा में गीत लिखती हैं। संभवतः वह गढ़वाली भाषा में गीत लिखने वाली सबसे छोटी कवियत्री हैं ।उनकी उम्र इस समय मात्र 16 वर्ष है ।आकृति मुंडेपी का पैतृक गांव पौड़ी गढ़वाल में नौखंडी है । वह वर्तमान में न्यू एरा एकेडमी कारबारी , देहरादून में कक्षा 11 की छात्रा है
आकृति मुंडेपी के अनुसार उनको गढ़वाली भाषा व संस्कृति से बेहद प्यार है तथा वह गढ़वाली भाषा व संस्कृति की सेवा करना चाहती है नि:संदेह आकृति अद्वितीय प्रतिभा की धनी है
कुछ दिनों पूर्व आकृति ने मुझे अपने स्वरचित 3 गीत भेजे। पहले तो मुझे यकीन ही नहीं आया कि 16 साल की अल्पवय बालिका गढ़वाली में इतना शानदार कैसे लिख सकती है ?
पर जब मैंने फोन से उनसे लंबी बातचीत की तो मुझे बहुत प्रसन्नता हुई और विश्वास हुआ कि निश्चय ही ये गीत आकृति मुंडेपी ने ही लिखे हैं।
प्रस्तुत कविता में आकृति ने तीनों ऋतुओं का वर्णन तो किया ही है , साथ ही प्रवासी भाई बंधुओं को जो गीत के माध्यम से ‘रैबार’ दिया है वह अद्भुत है कृपया इस होनहार बालिका के इस गीत को प्रोत्साहन स्वरूप अधिक से अधिक शेयर व कमेंट करें । मैं इस बाल कवियत्री के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं आप भी इस गीत का रसास्वादन करें
फेसबुक पर आने वाली यह उनकी प्रथम रचना है यह मेरा सौभाग्य भी है…
आकृति से गढ़वाली साहित्य को भविष्य में बहुत बड़ी उम्मीदें हैं….

आकृति को बहुत-बहुत बधाई…

म्यारु मुलक

परदेशी भै- बैण्यों घार मा आवा ।
अपुडु रौंतेळु मुलक देखि जावा ॥

डांडी कांठ्यूं मा जब मौळ्यार आंद
फूलौं ल धरती अछप ह्वै जांद
चौंफळा ,झुमैलो अर थड़िया गीत
ख्यलणा रंदन यख बैख- बाँद

छुचौ जलमभूमि तैं भेंटि जावा ।
अपुडु रौंतेळु मुलक देखि जावा ॥

सौण कु मैना बरखा झुकी आँदी
डाँडी- सार्यूं तै हैर्याळि कैरि जाँदी
गाड -गदनी करदिन स्वींस्याट
फर- फर कुयेड़ी बथौं मा उड़ाँदी

अपुड़ि मातृभूमि तैं बिसरि नि जावा ।
अपुडु रौंतेळु मुलक देखि जावा ॥

ह्यूंद का दिन , ह्यूंद कि रात
थर -थर -थर -थर कौंपदी गात
चुल्ला कु ध्वार बैठि आग तपणू
खाजा- भट बुखाणा कि आंदी भौत याद

घार ऐकि ठौ मा छुचौ द्यू जळावा
अपुडु रौंतेळु मुलक देखि जावा ॥

Copyright ..आकृति मुंडेपी

हरीश जुयाल कुटज की फेसबुक वाल से

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