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एक नजर इतिहास की ओर ; स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में टिहरी जनक्रांति का स्मरण आवश्यक

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में टिहरी जनक्रांति का स्मरण आवश्यक है। राजशाही के विरोध में सामने आए आंदोलनकारियों पर कठोर अत्याचारों के बावजूद नहीं बुझी क्रांति की मशाल। पढ़िए वीरेंद्र कुमार पैन्यूली का ये आलेख…

शायद टिहरी भारत की अकेली ऐसी रियासत थी, जहां जनता ने देश की आजादी के बाद निर्णायक जनक्रांति कर राजशाही से खुद की आजादी गढ़ी, खुद की विधानसभा बनाई, सरकार बनाई और फिर आजाद भारत में विलय का लक्ष्य हासिल किया। अन्यथा अंग्रेजों ने तो 500 से ज्यादा देसी रियासतों के रजवाड़ों को अपनी इच्छा से भारत या पाकिस्तान में मिलने अथवा स्वतंत्र बने रहने की छूट दे दी थी। तब सरदार वल्लभ भाई पटेल को कुछ रियासतों को विलय के लिए कार्रवाई तक का डर दिखाना पड़ा और कुछ पर कार्रवाई भी करनी पड़ी थी।टिहरी की आंदोलनरत जनता ने 11 जनवरी, 1948 को ‘बोलांदा बदरी’ (बोलने वाला बदरीनाथ) नाम से स्थापित सैकड़ों साल पुरानी राजवंशी सत्ता ध्वस्त कर दी। इसके बाद भारत सरकार के संज्ञान में टिहरी की अंतरिम सरकार गठित हुई और टिहरी विधानसभा का गठन किया गया व चुनाव भी हुए। स्वतंत्र भारत में मताधिकार के आधार पर चुनी गई यह पहली विधानसभा थी। खास बात यह कि चुनाव में महाराजा टिहरी के समर्थकों ने भी जनहितैषिणी सभा के नाम से हिस्सा लिया। आखिरकार भारत सरकार की एक अगस्त, 1949 की आधिकारिक घोषणा के अनुसार, टिहरी का उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) में विलय सुनिश्चित हुआ।

नरेंद्र नगर में आयोजित विलय के औपचारिक समारोह में उपस्थित संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने भी टिहरी को राजशाही से मुक्ति दिलाने के साथ ही उसे भारत में मिलाने के लिए टिहरी की जनता की सराहना की। 29 जनवरी, 1948 को टिहरी प्रजामंडल के कुछ सदस्यों ने जब महात्मा गांधी से मिलकर उन्हें टिहरी की अहिंसक जनक्रांति का समाचार दिया तो बापू ने उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा था, ‘तुमने अहिंसक सत्याग्रह के सिद्धांतों को जमीन पर उतारा है।’टिहरी रियासत में अहिंसक सत्याग्रह को सशक्त बनाने में क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन की अहम भूमिका रही। उन्होंने 23 जनवरी, 1939 को रियासत से बाहर देहरादून में टिहरी राज्य प्रजामंडल का गठन किया। फिर अप्रैल 1939 में चुनाव कराकर प्रजामंडल का रियासत में पंजीकरण कराने और उत्तरदायी शासन की मांग करने लगे। जिसके लिए उन्हें कई बार कैद और राज्य से निष्कासित भी किया जाता रहा। अंतिम बार टिहरी में कारावास झेलते हुए मांगें मनवाने को उन्होंने मई, 1944 से ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू किया और 25 जुलाई, 1944 को दोपहर इसी अवस्था में प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

रियासत के नुमाइंदों ने उनका शव बोरे में पैक कर रात को भिलंगना में बहा दिया, लेकिन सुमन की शहादत तक भी प्रजामंडल का पंजीकरण और उत्तरदायी शासन की टिहरी में स्थापना नहीं हुई। हालांकि, जगह-जगह प्रजामंडल बनते रहे और ऐसे करने वाले गिरफ्तार भी होते रहे। 31 दिसंबर, 1945 को उदयपुर में हुए अखिल भारतीय देसी राज्य लोक परिषद के विशाल अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए पं. जवाहर लाल नेहरू ने आजादी की लड़ाई में शहीद हुए अनेक जवानों में टिहरी राज्य के श्रीदेव सुमन का विशेष उल्लेख किया था।प्रजामंडल के गठन से पहले ही टिहरी के बालमन और विद्यार्थियों में देशभक्ति व प्रजातांत्रिक चेतना जगाने में सत्यप्रसाद रतूड़ी की अहम भूमिका रही। वे पत्रकार के साथ ही प्रताप हाईस्कूल के शिक्षक भी थे। टिहरी में बालसभा का गठन कर उन्होंने बच्चों में देशभक्तिकी अलख जगाई थी, लेकिन बगावती तेवरों के चलते उन्हें राज्य निकाला दे दिया गया। वर्ष 1940 में प्रताप हाईस्कूल के इंटर कालेज बनने पर टिहरी में 11वीं के छात्रों ने छात्रसंघ बनाने की मांग की। आंदोलनरत छात्रों के पोस्टर टिहरी नगर में जगह-जगह चिपके थे। दो छात्रों रामचंद्र उनियाल व रामप्रसाद बहुगुणा को कालेज से निष्कासन व लंबे कारावास का दंड भी मिला। बाद में रामचंद्र ही सकलाना गांव की आजादी के नायक बने।

रियासत में 1942 की अगस्त क्रांति की अलख भी युवाओं ने ही जगाई थी। टिहरी राजशाही के पतन से पहले ही 15 दिसंबर, 1947 को सकलाना में आजाद पंचायत की घोषणा कर दी गई थी। तब आजाद पंचायत के सरपंच रामचंद्र उनियाल ने कहा था, ‘हिंदुस्तान तो 15 अगस्त को आजाद हो चुका है, परंतु टिहरी की पांच लाख की आबादी अभी भी क्रूर सामंतशाही का दमन झेल रही है। आजादी हासिल करने को जितने कष्ट सहे, उससे ज्यादा मुश्किल आजादी को बनाए रखना और उसे आगे बढ़ाए रखना होता है। क्योंकि हमारे विरोधी हर तरीके से हमारी आजादी छीनने की कोशिश करेंगे।’ रंवाई में करों का विरोध करने वाली जनता को दंड देने व भयभीत करने के लिए 30 मई, 1930 को तिलाड़ी कांड को अंजाम दिया गया। इस कांड को गढ़वाल के जलियांवाला कांड के नाम से जाना जाता है। उस दिन राजा के प्रतिकार की रणनीति तय करने सैकड़ों किसान बड़कोट में तिलाड़ी मैदान पर जमा हुए थे। तब राजशाही की फौज ने तीन ओर से घेरकर लाठी-गोली की बौछार कर दी। चौथा खाली छोर यमुना नदी का था, जहां कई लोग जान बचाने नदी में कूद पड़े थे।

सकलाना की आजादी के बाद आजाद पंचायत उद्घोषणाओं का क्रम थमने का नाम नहीं ले रहा था। देवप्रयाग व कीर्तिनगर की पुलिस चौकी व कार्यालयों पर जनता ने कब्जा कर लिया था। बडियारगढ़ में भी आजाद पंचायत की घोषणा हो चुकी थी। वहां टिहरी पर कब्जा करने के लिए प्रजामंडल ने सत्याग्रहियों की भर्ती शुरू की थी। आजाद कीर्तिनगर में डांगचैरा से दादा दौलतराम के नेतृत्व में कोर्ट परिसर में पहुंचे किसान व ग्रामीण आंदोलनकारी जत्थों पर चलाई गई महाराजा के अधिकारियों की गोली से नागेंद्र दत्त सकलानी व मोलू भरदारी शहीद हो गए। महाराजा के अधिकारी इन शहादतों के बाद के आक्रोश को कीर्तिनगर तक ही सीमित रखने का षड्यंत्र कर रहे थे, लेकिन घटनास्थल पर मौजूद प्रजामंडल व साम्यवादी विचारधारा के नेताओं ने तय किया कि वे 11 जनवरी को शहीदों के शव लेकर खास पट्टी होते हुए टिहरी के लिए कूच करेंगे।इसके बाद भागीरथी व भिलंगना के संगम पर अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनका यही फैसला टिहरी राजशाही के ताबूत पर अंतिम कील साबित हुआ। जनक्रांति के बीच नरेंद्र नगर से महाराजा नरेंद्र शाह ने टिहरी नगर में घुसने का प्रयास भी किया, लेकिन अडिग वीरेंद्र दत्त सकलानी एडवोकेट, जो तब तक आजाद टिहरी पंचायत के प्रमुख घोषित हो चुके थे, ने साथियों सहित वह प्रयास विफल कर दिया। सकलानी ने टिहरी को डूबने से बचाने के लिए टिहरी बांध विरोधी संघर्ष समिति का भी वर्षों तक नेतृत्व किया। 14 जनवरी को सकलानी केनेतृत्व में टिहरी प्रजामंडल ने शासन संभाला। टिहरी में शहीदों के शव पहुंचने तक जगह-जगह से सत्याग्रहियों की भीड़ भी वहां पहुंच चुकी थी। हजारों टिहरीवासियों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

 

 

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