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१०० साल पहले होली इस तरह मनाई जाती थी

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होली विशेष : होली का रंग दरोगा पीतल की बाल्टियों और कुंडों में भर कर महफ़िलो में बैठे अहलकारों के सामने रखते थे होली का त्यौहार सदियों से होता रहा है। इन तारीखों के लिए साल भर से इंतजार होता था। 100 साल पुरानी होली का जिक्र आते ही शहर की भूली बिसरी यादें पुनः आ जाती हैं। क्या हिंदू क्या मुस्लिम, क्या ईसाई, क्या राजा, क्या लोग सब साथ होली खेलते थे। वो भी अचकन पहन कर खेलते थे।

टिहरी में शहर की होली अष्टमी से आरम्भ होती थीं। राज्य ज्योतिषी के लग्न के अनुसार अक्सर अष्टमी की सुबह से होली शुभारम्भ होती थीं। सुबह समस्त कर्मचारी गण तथा शहर के प्रमुख लोग सफेद चिट्टे-लठ्ठे की पोशाक पहिने याने अचकन, चूड़ीदार पजामा पहने और साफा बांधे राजमहल की ड्योढ़ी पर उपस्थित हो जाते थे। महाराजा भी इसी तरह सफेद कपड़ों की पोशाक में बाहर आते थे। सब लोग जय-जयकार करते, शोक शहर के मन्दिरों की देव मूर्तियों पर रंग चढ़ाने के लिए महल से रवाना होते।

राजमहल से शहर को आते हुए सबसे पहले श्री सत्येश्वर महादेव का मन्दिर पड़ता है। श्री महाराज तथा समस्त प्रजागण भगवान शिव को रंग लगाकार मन्दिर की परिक्रमा करने के पश्चात् फिर चरणामृत लेकर दूसरे मन्दिर की ओर चल पड़ते। इसी तरह श्री रघुनाथ जी के मन्दिर तथा श्री बद्रीनाथ जी के मन्दिर तथा अन्य पूजा गृहों में भी देव पूजन, होली का रंग चढ़ाना और परिक्रमा आदि करने के पश्चात् लोग आपस में एक दूसरे को रंग लगाते। आज के दिन सिर्फ कोरा रंग ही चलता। भीगा रंग नहीं।

नवमीं से होली का दरबार लगता। महाराजा का महल तो नये दरबार चनाखेत में था लेकिन यह होली की महफिल पुराने दरबार मंे लगती थीं जहां तत्कालीन महाराजा नरेन्द्रशाह की दादी रहती थी। पुराने दरबार में महारानी गुलेरिया राज दादी के महल के सामने, चांदनी लगती थी। कुल कर्मचारीगण चाहे किसी वर्ग के हों-हिन्दू हों या मुसलमान अथवा ईसाई जो भी हों, सबकी होली के इस उत्सव मंे शामिल होते थे।

प्रत्येक कर्मचारी होली की सफेद चमकती पोशाक में चाँदनी के नीचे अपने-अपने पद के अनुसार बैठ जाते थे। महाराजा की मसनद, जो बिल्कुल सफेद होती थी, सबसे पर सिराहने पर लगती थी, मसनद के पीछे की पंक्ति में महाराज के कुटुम्बी जन तथा बिरादरी के ठाकुर लोग बैठते थे। दाहिनी तरफ रियासत के समस्त कर्मचारी अपने-अपने दर्जे के मुताबिक बैठ जाते थे और बांयीं ओर शहर के या रियासत के अन्य लोग, जो महफिल में शामिल होना चाहते थे, बैठते थे। जब सब लोग अपने-अपने स्थानों पर बैठ जाते थे तब प्रत्येक महफिल में भाग लेने वाले को पीला सूखा रंग व लाल गुलाल आदि अंजुली भर-भर कर दिया जाता था। महाराजा की मसनद के सामने कई रंगों से भरी रकाबियां रखी जाती थीं और एक बड़े थाल में विभिन्न रंगों के कुमकुमे सजा के रखे जाते थे।

गीले, पानीदार भाॅति-भाॅति के रंगों, जिन रंगों को टेसू व अन्य रंगीन लकड़ियों को उबाल कर बनाया जाता था, होली दरोगा कई दिन पूर्व से जिनकी समुचित तैयारी कर लेता था, उनको पीतल की बाल्टियों व कुंडों में भरकर महफिल में बैठे अहलकारों के सामने व अन्य व्यक्तियों के सम्मुख स्थान-स्थान पर परस दिया जाता था, साथ ही पिचकारियां भी हर बाल्टी व कूण्डे के साथ रखी होती थीं। महाराज के सामने भी रंग भरा कुंड होता था जो प्रायः चाॅदी का होता था। यह गीला रंग बड़ा शोख और चटक होता था- लाल, पीला व बैंगनी।
होली की जब सब तैयारी हो जाती थीं तो महाराजा अपनी दादी जी के भवन से बाहर आते थे।

महाराजा के अपने आसन पर बैठ जाने के बाद उसी समय पान-सुपारी, मिसरी, इलायची एवं इत्र सब लोगों को वितरित किया जाता था। इस वितरण के पश्चात् सबसे पहले दीवान या वजीर श्री महाराज के पर रंग डालते और तब उसके साथ ही या उसके तुरन्त बाद सब लोग महाराजा पर कोरे रंग की बखेर करके फिर आपस में चारों ओर रंग मलना शुरू कर देते। कोरे रंग के बाद फिर भीगे रंग की पिचकारियां चलने लगती। यह रंग भरी होली करीब घण्टे 2 तक यह मनभावन रंगीन खेल चलता रहता था। इस दरमियान जो तवायप्फें दरबार में हाजिर होती थीं उनके गाने व नाच का प्रोग्राम चलता रहता सारंगी की धुन , तबले की ठन-ठन और घुंघरूओं की झुन-झुन से वातावरण बड़ा दिलचस्प हो जाता था। जब महाराज होली खेलकर खड़े हो जाते थे तब सारी महफिल भी खड़ी हो जाती थी, होली दरबार बरखास्त। सब अपने-अपने घरों को चल देते।

इन दिनों अक्सर रात को शहर में दावतें भी हुआ करतीं जहां कार्यक्रम भी चलता। यह कार्यक्रम लगातार अष्टमी से पूर्णमासी तक चलता रहता। इन दिनों तातील रहती, दफ्तर वगैरह बन्द रहते। सिर्फ होली खेलने का ही काम रहता।पूर्णमासी की रात्रि को होलिका दहन होता था। होलिका दहन भी ज्योतिषियों के बताए हुए समय पर शहर के एक खास निर्दिष्ट स्थान सेमल के तप्पड़ में हुआ करता था। वहां सेमल के तप्पड़ मंे भी उसी तरह शामियाना-चांदनी लगती थी, उसी तरह प्रजावर्ग के लोग व राज्य कर्मचारी सफेद पोशाक मे उपस्थित होते थे और वहां रात्रि मंे होली खेली जाती थी, सूखा रंग चलता था।
होलिका दहन के लिए एक चीड़ की लम्बी लकड़ी बीच मंे गाढ़कर उसके चारों ओर लकड़ियां जमा की जाती थीं। मुहूर्त पर महाराजा होलिका पूजा करने के पश्चात् होलिका दहन करते और फिर उसकी परिक्रमा। अन्य लोग भी पूजन व परिक्रमा करते फिर सब अपने-अपने घरों को प्रस्थान करते।

होलिका दहन के बाद वहां पर पुलिस का पहरा लग जाता था और दूसरे दिन सुबह जब होलिका दहन की अग्नि शांत हो जाती थी तो सबसे पहले वहां की राख श्री महाराज के महल में भेजी जाती। तथा अन्य कर्मचारियों के घरों पर भी पहुंचाई जाती। लोग इस विभूति को साल भर अपने घरों मंे बड़े आदर के साथ रखते। यह विश्वास किया जाता था कि इस विभूति के लगाने से बच्चों के तो सभी छल आदि रोग दूर हो जाते हैं।फिर होलिका दहन के दूसरे दिन रंग नहीं राख की होली खेली जाती थी, जिसे छरोली कहा जाता था। तमाम शहर में अच्छा हो-हल्ला रहता था। होली के नवाब का जलूस निकलता और अन्त मंे सब होलिका दहन स्थल पर पहुंचते उत्सव समाप्त होता। घर आकर स्नान करते, आम का बौर चखते, इस तरह यह हंसी-खुशी का त्यौहार समाप्त हो जाता था। आह! वे दिन याद करके और आज की होली देखकर विश्वास नहीं होता कि कभी कहीं ऐसी भी होली होती थी। सेवानिवृत्त जज श्री उमा दत्त डंगवाल के संस्मरण और टिहरी के पुराने लोगों की बातचीत के आधार पर

by शीशपाल गुसाईं

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