टेक्नोलॉजी

संघर्ष रोकने में मददगार आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस

मानवता इस वक़्त बहुत बड़े संकट से जूझ रही है. इसकी बड़ी वजह हैं हिंसक संघर्ष. दुनिया के कई देशों में हिंसक संघर्ष छिड़ा हुआ है, जिससे करोड़ों लोग प्रभावित हैं. हिंसा की वजह से हर साल हज़ारों लोग मारे जाते हैं.

बहुत से वैज्ञानिकों का मानना है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इस संघर्ष को रोकने में मदद कर सकता है.

वाइसी गुओ ऐसे ही रिसर्चर हैं. वाइसी, ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सटी से जुड़े हुए हैं. वो ब्रिटेन में डेटा साइंस और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के राष्ट्रीय संगठन, एलन तुरिंग इंस्टीट्यूट में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस टीम के प्रमुख हैं.

वाइसी गुओ और उनकी टीम, मानवता के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने के परंपरागत तरीक़ों में मशीनी जानकारी जोड़कर उसे नए सिरे से समझती है.

वाइसी गुओ की टीम, दुनिया के किसी हिस्से में होने वाले हिंसक संघर्ष का पूर्वानुमान लगाने का काम कर रही है. इसके लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी बनावटी अक़्ल की मदद ली जा रही है.
ऐसे पूर्वानुमान से शांति स्थापना के लिए काम करने वाले संगठनों की मदद होगी. ख़ास तौर से संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की.

शांति के मिशन अक्सर पैसे की कमी से जूझते हैं. यही नहीं, उनके पास आंकड़ों की कमी भी होती है. कहां दखल देने की ज़्यादा ज़रूरत है, ये बात शांति रक्षक टुकड़ियों को नहीं होती.
ताकि संघर्ष और न भड़के
अब वाइसी गुओ की टीम ऐसी जगहों का अंदाज़ा मशीन की मदद से लगाने में जुटी है, जहां आने वाले वक़्त में हिंसा भड़क सकती है. इसका दायरा कितना बड़ा हो सकता है. ये कितनी जल्दी बड़े इलाक़े में फैल सकती है, या फिर संघर्ष सीमित ही रहेगा.

वाइसी गुओ और उनके साथी ये भी अंदाज़ा लगाते हैं कि किसी संघर्ष के अहम किरदार, जैसे अस्थायी सरकार, अलगाववादी और संयुक्त राष्ट्र का कितना बड़ा रोल हो सकता है.

इन पूर्वानुमानों की मदद से कूटनयिक प्रयास किए जा सकते हैं, ताकि संघर्ष और न भड़के.

किसी जगह हिंसा भड़कने के कई आयाम हो सकते हैं. वहां का भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, सामाजिक ताना-बाना समझना किसी भी संघर्ष को समझने में मददगार हो सकते हैं.

संघर्ष बड़ा या छोटा होगा, ये कई बार किसी एक किरदार का रोल बड़ा या छोटा होने की वजह से तय होता है.

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