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श्रीनगर गढ़वाल में बसंतोत्सव पर लोगों को पारंपरिक लोक संस्कृति के विविध रंगों से रूबरू कराएंगे कलाकार

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उत्तराखंड के पावन पर्व बसंत पंचमी के अवसर पर लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के तहत दिनांक 30 जनवरी को नगर पालिका सभागार में समय प्रातः 11 बजे परम्परागत लोक गीतों थडिया, चौफला और झुमैला लोक गीतों के गायन के साथ ही परंपरागत वाद्य यंत्रों का वादन लोक कलाकारों के द्वारा किया जाना है।

पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।वसन्त पञ्चमी के समय सरसो के पीले-पीले फूलों से आच्छादित धरती की छटा देखते ही बनती है।

इस पावन पर्व बसंत पंचमी के अवसर पर लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के तहत परम्परागत लोक गीतों, थडिया, चौफला और झुमैला लोक गीतों के गायन के साथ ही परंपरागत वाद्य यंत्रों का वादन लोक कलाकारों के द्वारा किया जाना है।

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