उत्तराखंड

बिखरे गैरसैंण आंदोलन को एकजुट करने की चुनौती

शंकर सिंह भाटिया: देहरादून। गैरसैंण धीरे-धीरे लोगों के जहन में स्थान बनाता जा रहा

यह एक स्थान विशेष के लिए चलाया गया आंदोलन नहीं है, बल्कि इन सत्रह सालों में उत्तराखंड पर राज करने वालों की नीतियों का प्रतिरोध देहरादून से राज्य संचालित करने वाले बिल्कुल उसी तरह काम कर रहे हैं, जैसे सन् 2000 से पहले लखनऊ में बैठे शासक काम कर रहे थे। बल्कि कई मायनों में उत्तराखंड के आम व्यक्ति को लखनऊ में विशेषाधिकार मिल जाता था, कि वह बदरीनाथ की भूमि से आया है, उसके काम कुछ लिए दिए बिना जल्दी कर दो। देहरादून में वह इस विशेषाधिकार से भी वंचित हो गया। यदि औरीजनल उत्तराखंड की बात करें तो इन 17 सालों में उसने सिर्फ खोया ही खोया है, पाया कुछ भी नहीं इसीलिए मनों की पीढ़ा अब गैरसैंण आंदोलन के रूप में उभर रही यह बात अलग है कि एक ही लक्ष्य होने के बावजूद इस आंदोलन में विखराव ज्यादा लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह उभरकर आ रही है कि जिन क्षेत्रों से पहले गैरसैंण को समर्थन नहीं मिलता था, वे भी अब समर्थन में सामने आ रहे हैं। गैरसैंण आंदोलन की मजबूती इस बात पर भी है कि यह बहुत धीमे सुलग रहा है, 1994 के उत्तराखंड आंदोलन की तरह दावानल बनने की तरफ अग्रसर नहीं
वर्तमान गैरसैंण आंदोलन की जब शुरूआत हुई तो, आंदोलन शुरू करने वालों तक को इतना भरोसा नहीं था कि गैरसैंण के नाम पर होने वाले आंदोलन को जनता का समर्थन मिल पाएगा कि नहीं, इसलिए उन्होंने गैरसैंण के साथ नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन भी जोड़ दिया। उसके बाद गैरसैंण आंदोलन का प्रसार बढ़ता चला गया। जगह-जगह समर्थन में लोग आंदोलन में कूदने लगे। कुछ स्थानों पर आंदोलन इस कदर ताकत बनकर उभरा कि राज्य सरकार भी इसके ताप को बहुत करीब से महसूस करने लगी। सबसे बड़ा सवाल एक ही है कि एक ही मुद्दे पर खडा हुआ यह आंदोलन सही दिशा में आगे बढ़े।

आंदोलनकारी शक्तियों को एक बात ध्यान में रखनी होगी कि यह उत्तराखंड आंदोलन की तरह आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो की तर्ज पर लड़ने के बजाय ठोस रणनीति पर गैरसैंण आंदोलन लड़ा जाए। गैरसैंण उत्तराखंड की राजधानी क्यों बने, इसके क्या लाभ-हानि होंगे? इस पर गहन मंथन हो। गैरसैंण को बदनाम करने के लिए दीक्षित आयोग समेत गैरसैंण विरोधियों ने जिस तरह की भ्रांतियां फैलाई हैं, जिस तरह के आंकड़े पेश किए हैं, उनकी काट सामने आनी चाहिए। उत्तराखंड आंदोलन का जिस तरह कोई ब्लू प्रिंट नहीं था, सिर्फ राज्य की मांग रखी गई थी, जिसका इतना बड़ा खामियाजा उत्तराखंड को भुगतना पड़ रहा है, उस तरह की गलती नहीं दोहराई जानी चाहिए। मजबूत ब्लू प्रिंट के साथ सारे तथ्य सामने आने चाहिए।

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