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नागरिक रजिस्टर” का यह फासीवादी खेल बंद हो

रुण माहेश्वरी

असम में नागरिकता रजिस्टर के खेल का जो पागलपन चल रहा है इसका तार्किक अंत भारत का ही अंत होगा। एक झटके में एक राज्य में चालीस लाख लोगों की नागरिकता को प्रश्नांकित कर दिया गया है । पहले से ही असंख्य तनावों में जी रहे भारत के ये नागरिक अब आगे एक और भारी तनाव में, अपनी नागरिकता को साबित करने के अतिरिक्त तनाव में जीयेंगे ! यह अभी तक सिर्फ एक राज्य की कहानी है। आरएसएस वाले रहेंगे तो यह खेल अन्य राज्यों में भी देर-सबेर चलेगा। मतलब, दसियों करोड़ों भारतीय अपनी नागरिकता को लेकर भारी तनाव में होंगे । और प्रशासन तथा पागल, सांप्रदायिक उन्माद से भरे लोग उन्हें उजाड़ने के नाना कृत्यों में लगे रहेंगे । आरएसएस वालों ने तो पहले से ही सैद्धांतिक रूप से अपने इन अपराधपूर्ण कामों की निशानें चुन कर रखे हुए हैं । वे भारत में हर मुस्लिम बस्ती को मिनी पाकिस्तान कहते हैं और उसे उजाड़ना अपना पवित्र कर्त्तव्य मानते हैं । अब यह ‘नागरिकता रजिस्टर’ नागरिकों के बीच एक स्थायी तनाव कायम रखने का उनके हाथ में नया औजार आ गया है ।

इसीलिये हम कहते हैं, इस पागलपन का अंतिम लक्ष्य यदि नागरिकता संबंधी किसी सख्त पैमाने से भारत के वर्तमान रूप का पुनर्गठन करना है तो इसकी अंतिम दिशा भारत का अंत करने के अलावा कुछ नहीं हो सकती है । जो आज सन् ‘70 को एक कट-ऑफ लाइन कह रहे हैं, ये वही लोग हैं जो अपनी चेतना में हजारों साल पहले आर्यों के बसने तक की तिथि को कट-ऑफ लाइन बनाने पर विश्वास करते हैं । अंकगणित के नियम के अनुसार ही किसी चीज में बदलाव के लिये उतना ही दबाव डाला जाता है, जो उसके आकार-प्रकार के अनुरूप हो । यदि किसी पर उसकी सहने की शक्ति से ज्यादा दबाव दे दिया जायेगा तो वह पिचक कर बिखर जायेगा, दम तोड़ देगा । आज के भारत में खड़े होकर कोई यदि चेतना के स्तर पर सिंधु घाटी की सभ्यता के काल के नक्शे पर काम कर रहा होगा तो यह जाहिर है कि वह भारत मात्र के अंत के लिये काम कर रहा होगा । सारी दुनिया की ताकत लगा कर भी उस काल को फिर कभी लौटाया नहीं जा सकता है, वर्तमान भारत को नष्ट जरूर किया जा सकता है ।

इसीलिये, जब आपको किसी चीज में कोई सुधार या परिवर्तन करना होता है तो यह उसकी वर्तमान संरचना के सारे तत्वों को समझ और स्वीकार करके ही किया जा सकता है । भारत का वर्तमान वैविध्यमय रूप ही भारत है । उसके इस चरित्र में किसी भी प्रकार का खलल भारत के अस्तित्व में खलल होगा । राजनीति के खिलाड़ी तत्काल ‘भारत को विदेशियों की खुली शरण-स्थली बनने नहीं दिया जा सकता है’ की तरह की दलीलें देना शुरू कर देंगे, जैसा कि अमेरिका का ट्रंप और ब्रिटेन की थेरेसा मे भी कर रहे हैं । राष्ट्रीय राज्य की पूरी अवधारणा के मूल में एक भौगोलिक इकाई और राज्य के द्वारा उसकी सीमा की हिफाजत निहित है । लेकिन कोई भी राज्य उसके नागरिकों और मनुष्यों से बनता है । उसकी आबादी की संरचना में इतिहास की एक बड़ी भूमिका होती है ।

राष्ट्र के अस्तित्व को वही आबादी कायम भी रखती है । जो लोग तीस-चालीस साल से भारत के कल-कारखानों, खेत-खलिहानों, सरकारी-गैर-सरकारी दफ्तरों, यहां तक कि सेना-पुलिस में भी काम करते हुए राष्ट्र के निर्माण में लगातार योगदान कर रहे हैं, अचानक, शुद्ध राजनीतिक नफे-नुकसान के लिये, उन्हें कहा जाए कि तुम इस देश के नागरिक नहीं हो – यह सिर्फ मानव-विरोधी, इतिहास-विरोधी ही नहीं है, राष्ट्र-विरोधी भी है । यह भारत में नये सिरे से उस धरती-पुत्र के नारे के लिये जमीन तैयार करने की कोशिश है जिसको आधार बना कर कभी अमेरिकियों ने भारत के बाल्कनाइजेशन, इसके खंड-खंड में विभाजन की योजना बनाई थी । भारत में बाहरी अनुप्रवेश को रोकने की अनेक-स्तरीय प्रशासनिक कार्रवाइयां हमेशा से चलती रही हैं ।

आज भी चल रही है । सीमाओं पर पहरेदारी से शुरू करके राशन कार्ड, मतदान का अधिकार आदि सब इसी के अंश हैं । इनमें नाना कारणों से हमेशा कुछ कमियां भी रहती हैं । लेकिन उनमें सुधार के बजाय लगभग पचास साल से बसे, कई पीढ़ियों के लोगों को अनुप्रवेशकारी बता कर कठघरे में खड़ा करना राज्य के द्वारा उनके नागरिक अधिकारों के हनन का अपराध है । ऊपर से, अब आरएसएस वालों ने अपनी राजनीति के अनुसार, इसमें हिंदू-मुस्लिम के सवाल को भी उठाना शुरू कर दिया है, जिसके उत्स के रूप में हमने हजारों साल पहले आर्यों के बस जाने की कट-ऑफ तिथि की बात कही है ।

कहने का तात्पर्य यही है कि असम में नेशनल रजिस्टर का यह खेल नागरिकों की स्वतंत्रता के खिलाफ एक फासिस्ट संघी खेल है, जिसका अंतिम गंतव्य भारत के अंत के सिवाय कुछ नहीं हो सकता । यह भारत को दुनिया में सबसे बड़े गैर-नागरिकों की आबादी वाला देश बना कर इसे एक स्थायी गृह युद्ध की आग में धकेलने का खेल है । इसे तत्काल बंद किया जाना चाहिए । असम के जिन चालीस लाख लोगों को ‘गैर-नागरिक’ घोषित करके अभी गहरे तनाव और संताप में डाल दिया गया है, राज्य को उनसे क्षमा मांगनी चाहिए और जिनके पास भी भारत की नागरिकता संबंधी एक भी प्रमाणपत्र है, उसे स्वीकृति देते हुए उन्हें चिंता-मुक्त किया जाना चाहिए ।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक, स्तंभकार, टिप्पणीकार हैं ।

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