पर्यटन

औली – आइये और स्कीइंग का लुत्फ़ लीजिये

Facebooktwittermailby feather

औली एक खूबसूरत पर्यटन स्थल है जो पूरी दुनिया में स्कीइंग के लिए प्रसिद्ध है। यह खूबसूरत जगह समुद्रतल से 2800मी. ऊपर स्थित है। यह जगह ओक धार वाली ढलानों और सब्ज़ शंकुधारी जंगलों के लिए जानी जाती है। औली का इतिहास 8वीं शताब्दी में पाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, गुरु आदि शंकराचार्य इस पवित्र स्थान पर आए थे। इस जगह को ’बुग्याल ’ भी कहा जाता है जिसका स्थानीय भाषा में अर्थ है ’घास का मैदान’। ओस की ढलानों पर चलते हुए पर्यटक नंदादेवी, मान पर्वत तथा कामत पर्वत शृंख्ला के अद्भुत नज़ारें देख सकते हैं। यात्री इन ढलानों से गुज़रने पर सेब के बाग और हरेभरे देवदार के पेड़ देख सकते हैं।

औली बहुत ही विषम परिस्थितियों वाला पर्यटक स्थल है। यहां घूमने के लिए पर्यटकों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि औली आने से पहले शारीरिक व्यायाम करें और रोज दौड लगाएं। औली में बहुत ठंड पडती है। यहां पर ठीक रहने और सर्दी से बचने के लिए उच्च गुणवत्ता के गर्म कपडे पहनना बहुत आवश्यक है। गर्म कपडों में कोट, जैकेट, दस्ताने, गर्म पैंट और जुराबें होनी बहुत आवश्यक है। इन सबके अलावा अच्छे जूते होना भी बहुत जरुरी है। घूमते समय सिर और कान पूरी और अच्छी तरह से ढ़के होने चाहिए। आंखो को बचाने के लिए चश्में का प्रयोग करना चाहिए। यह सामान जी.एम.वी.एन. के कार्यालय से किराए पर भी लिए जा सकते हैं। जैसे-जैसे आप पहाडों पर चढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे पराबैंगनी किरणों का प्रभाव बढता जाता है। यह किरणों आंखों के लिए बहुत हानिकारक होती है। इनसे बचाव बहुत जरूरी है। अत: यात्रा पर जाते समय विशेषकर बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले चश्मे का होना बहुत जरूरी है। वहां पर ठंड बहुत पडती है। अत्यअधिक ठंड के कारण त्वचा रूखी हो जाती है। त्वचा को रूखी होने से बचाने के लिए विशेषकर होंठो पर एस.पी.अफ बाम का प्रयोग करना चाहिए।
ठंड मे ज्यादा देर रहने से शरीर की नमी उड जाती है और निर्जलीकरण की समस्या आमतौर पर सामने आती है। इस समस्या से बचने के लिए खूब पानी पीना चाहिए और जूस का सेवन करना चाहिए। अपने साथ पानी की बोतल रखना लाभकारी है। शराब और कैफीन का प्रयोग न करें। बर्फ में हानिकारक कीटाणु होते हैं जो आपके स्वास्थ्य और शरीर को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। अत: बर्फ को खाने का प्रयास न करें।

भ्रमण आवास

औली में रूकने के लिए क्ल्फि टॉप रिसोर्ट सबसे अच्छा स्थान है। यहां से नंदा देवी, त्रिशूल, कमेत, माना पर्वत, दूनागिरी, बैठातोली और नीलकंठ का बहुत ही सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। इसमें 46 कमरें हैं। यह स्की क्षेत्र की ढलान पर टावर न. 8 के नीचे स्थित है। यहां पर खाने-पीने की अच्छी सुविधा है। यह चारों तरफ से बर्फ से घिरा हुआ है। जोशीनाथ से जी.एम.वी.एन. तक केबल कार की अच्छी सुविधा है। अगर कार से यात्रा करनी हो तो कार को बहुत ही सावधानीपूर्वक चलाना चाहिए। इसके अलावा केबल कार भी अच्छा विकल्प है। स्की के शौकीन लोगों के लिए औली स्वर्ग है। जो पर्यटक स्की नहीं करना चाहते और जल्दी थक जाते हैं वह औली की सुन्दरता का आनंद ले सकते हैं। समय व्यतीत करने के लिए उन्हें अपने साथ कुछ रोचक किताबें लानी चाहिए।
यहां एक रिसोर्ट भी है जो स्किंग के अलावा रॉक क्लाइम्बिंग, फॉरस्ट कैम्पिंग और घोडे की सवारी आदि के लिए व्यवस्था करता है। इन सबके लिए ज्यादा पैसे चुकाने पडते है। इसके अलावा इसमें एक रेस्तरां और कैफे भी है। जो पर्यटक ज्यादा पैसे खर्च नहीं करना चाहते औली में उनके लिए जी.एम.वी.एन. स्किंग और टूरिस्ट रिसोर्ट सबसे बेहतर विकल्प है। यह 9,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां ठहरने का सबसे बडा़ फायदा यह है कि यहां से बर्फ की सुन्दर चोटियों का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। यह मुख्य सड़क मार्ग के बिल्कुल पास है। इस रिसोर्ट में लकडी की बनी 16 झोपडियां, सोने के लिए 3 सराय जिसमें 42 बेड हैं, स्की कराने की व्यवस्था, वातानुकूलित और गर्म पानी की सुविधा है। यहां भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस का स्की स्कूल है। पर्यटकों को इसमें प्रवेश की अनुमति नहीं है। इसके अलावा यहां पर जंगलों में भी घूमा जा सकता है। इन जंगलों में खूबसूरत बलतु और कॉनीफर के वृक्ष पाए जाते हैं।
औली में जब बर्फ पडती है तो बहुत पर्यटक आते हैं। पर्यटकों की बढी संख्या के फलस्वरूप सभी होटल भर जाते हैं। इस स्थिति में पर्यटक जोशीमठ में रूक सकते हैं। जोशीमठ में कई अच्छे होटल है।

खाना पीना

औली नंदा देवी के बहुत पास है। यहां पर अस्थायी ढाबों और कूडा़ बिखेरने पर प्रतिबंध है। यहां पर मांसाहारी खाना केवल एक ही होटल मे मिलता है और वह होटल ऊंची चोटी पर हैं। यहां पर कोई शराब खाना भी नहीं है। जिन पर्यटकों को शराब पीने की आदत है उन्हें अपनी बोतल खुद लानी पडती है। लेकिन इस बात का ध्यान रखना चाहिए की यह एक तीर्थस्थल भी है और ऐसी जगहों पर शराब का सेवन तीर्थयात्रियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।

जिला: चमोली

लोकेशन: यह नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के पास गढवाल के ऊपरी क्षेत्र में लगभग 9,500 से 10,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। दूरी: यह षिकेश से उत्तर पूर्व में 268 किमी. और दिल्ली से उत्तर पूर्व में 492 किमी. की दूरी पर स्थित है। दिल्ली से सडक मार्ग द्वारा औली पहुंचने के लिए 15 घंटो का समय लगता है।

पर्यटन समय

औली जाने के लिए सबसे अच्छा मौसम जनवरी-मार्च का है। इस समय यहां पर बर्फ पडती है। यह समय स्की करने के लिए बिल्कुल आदर्श है।
भारत का स्विट्जर्लेंड औली |

ऊँचे ऊँचे आसमान छूते सफ़ेद चमकीले पहाड़ मीलों दूर तक फैली सफ़ेद बर्फ की चादर दूर दूर तक दिखते बर्फीली चोटियों के दिलकश नज़ारे ! नहीं भई इसके लिए स्विट्जर्लेंड जाने की जरुरत नही ऐसी जगह तो हमारे पास भी मोजूद है हम बात कर रहे हैं औली की जो की उत्तराखंड में है । यहाँ का नजदीकी रेल्वे स्टेशन है हरिद्वार । हरिद्वार से लगभग 275 किलोमीटर दूर है जोशीमठ ,जोशीमठ से 16 किलोमीटर दूर है ओली । उत्तराखंड के सबसे उपरी भाग पर स्थित औली भारत का सबसे बड़ा स्कीइंग स्थल है जो कि लगभग 3 किलोमीटर लंबा ढलान है । वैसे तो यहाँ हर समय तापमान 0 डिग्री से नीचे रहता है मगर फ़िर भी यहाँ आने के लिए दिसम्बर से मार्च तक का समय ठीक रहता है । यहाँ का तेज रफ्तार केबल सिस्टम ( रोप वे ) देवदार के व्रक्षौं के ऊपर से होते ढलानों के उपरी छोर तक पहुंचाता है जिससे ऊपर चढ़ने की थकावट की चिंता नहीं रहती । यहाँ ढलानों के रख रखाव के लिए आयातित स्नो पेकिंग मशीनों की व्यवस्था है जो ढलानों पर पपड़ी नही ज़माने देती और उन्हें व्यवस्थित रखती हैं । यहाँ गढ़वाल विकास निगम द्वारा देनिक, 7 दिवसीय (प्रमाण पत्र रहित ) और 14 दिवसीय (प्रमाण पत्र सहित ) स्कीइंग प्रशिक्षण कार्यक्रम जनवरी से मार्च तक चलाए जाते हैं ।
यहाँ आएं तो यहाँ का 3048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चारागाह जिसे यहाँ की स्थानीय भाषा में बुग्याल कहा जाता है देखना न भूलें । यहाँ की प्राकर्तिक सुन्दरता देखते ही बनती है यहाँ से हिमालय का नजारा इतना अदभुत दिखता हे कि आप देखते ही रह जाएँगे यहाँ पर स्कीइंग की सुविधा भी उपलब्ध है । तो फ़िर देर किस बात की जल्दी औली जाने का प्रोग्राम बनाइये और भारत में ही स्विट्जर्लेंड का मजा लीजिये यकीन मानिये यह एक ऐसा प्राकर्तिक खूबसूरत स्थल है जिसके सामने स्विट्जर्लेंड की खूबसूरती बौनी पड़ जाए ।

औली
जिन लोगों ने कभी स्कीइंग करने या सीखने में अरमान संजो रखा हो, उनके लिए बहुत अच्छी जगह है औली, जो ऋषिकेश के पास स्थित है। देश में गुलमर्ग (कश्मीर) और नारंकडा (हिमाचल प्रदेश) के बाद स्कीइंग का नवीनतम तथा विकसित केंद्र औली है, जहां लोग स्कीइंग करने का अपना अरमान पूरा कर सकते हैं। वस्तुत: यह उत्तरप्रदेश का पहला, भारत का सबसे नया और एशिया का अत्यंत सुंदर स्कीइंग सेंटर है।

बदरीनाथ धाम के निकट नंदा देवी राष्ट्रीय उद्याग की गोद में मखमली घासवाले मैदान तथा घने जंगल से घिरे इस क्षेत्र के आसपास बड़ी–बड़ी ढलानें हैं, जो स्कीइंग के लिए सर्वथा अनुकूल हैं। समुद्र–तल से 2500 से लेकर 3050 मीटर की ऊंचाई तक 6 वर्ग किलोमीटर में फैला औली वस्तुत: एक लंबी–चौड़ी चरागाह है। बरसात के मौसम में, प्राचीनकाल की तरह अभी भी , यहां हर तरफ घास उग आती है। साथ ही, पचासों किस्म के फूल भी खिल आते हैं, जिन्हें देखना और देखते रहना बहुत सुखद लगता है।

ये ढलानें दिसंबर के मध्य से मार्च के मध्य तक सफेद कालीन जैसी बर्फ की मोटी परतों से ढकी रहती हैं। तब स्कीइंग करने वालों के समूह के कारण यहां का नजारा बहुत ही मोहक दिखता है। प्रति व्यक्ति लगभग 1000 रुपए लेकर 7 दिनों तक और इससे लगभग दोगुनी राशि लेकर 15 दिनों तक प्रशिक्षण देने वाले इस केंद्र में प्रशिक्षण–प्रबंध तो उत्तम है ही। भोजन, ठहराव, स्कीइंग के आधुनिक उपकरण, अन्य हिम क्रीड़ाओं के सामान आदि उपलब्ध कराने की भी अच्छी व्यवस्था है। स्कीइंग के लिए ढलान तैयार करने वाली विशेष रूप से निर्मित बुलडोजर से भी बड़ी मशीन ‘स्नोवीटर’ से यहां के ढलान दुरुस्त किए जाते हैं। अब तो यहां चेयर लिफ्ट, स्की लिफ्ट और रोप वे की भी सुविधा पर्यटकों को उपलब्ध कराई जाने लगी है। इससे आसपास के कल्पनातीत मनोरम दृश्यों को देखना संभव हो पाता है। यही कारण है कि स्कीइंग करने वाले और न करने वाले– दोनों ही तरह के पर्यटकों, जिनमें हनीमून मनाने वाले युगल भी काफी होते हैं–अच्छी–खासी संख्या में यहां आते हैं।

कुछ प्रमुख नगरों से दूरी
श्रीनगर – 147 किलोमीटर
पौड़ी – 176 किलोमीटर
ऋषिकेश – 252 किलोमीटर
हरिद्वार – 277 किलोमीटर
देहरादून – 295 किलोमीटर
दिल्ली – 500 किलोमीटर

बेहतर समय
हालांकि गर्मी के दिनों में भी औली में काफी आनंद आता है और बरसात के मौसम में अनगिनत प्रकार के फूल–पौधे देखने को मिलते हैं, लेकिन इस स्थान की विशेषता और महत्ता को देखते हुए यहां दिसंबर के मध्य से मार्च के मध्य तक की अवधि में आने पर यात्रा अधिक सार्थक होती है।

पहुंचने के साधन
चूंकि औली को अभी तक रेल–मार्ग और वायु–मार्ग द्वारा सीधे नहीं जोड़ा गया गया है, अत: इन दोनों साधनों द्वारा यहां तक नहीं पहुंचा जा सकता। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश का है। वहां से सड़क–मार्ग द्वारा (बस या टैक्सी से) औली पहुंचा जा सकता है। वैसे, देश के हर प्रमुख शहर से ऋषिकेश सड़क–मार्ग द्वारा भी जुड़ा हुआ है। अत: बस या टैक्सी या कार द्वारा देश के किसी भी भाग से औली पहुंचा जा सकता है।

होटल
यहां पर्यटकों के रहने के लिए गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा लगभग दो दर्जन हट्स बनाए गए हैं, जिनमें से कुछ फाइबर ग्लास के हैं। सामान्य हट्स तो हनीमून मनाने वाले युगलों या अन्य युवा दंपतियों को काफी प्रिय हैं। इस स्थान पर कमरों के अलावा डॉरमेट्री भी उपलब्ध हैं– कम राशि पर। यहां पर कैंटीन और अच्छे रेस्तरां भी हैं।

दर्शनीय स्थल
जाड़ा, गर्मी और बरसात–तीनों मौसम में औली घूमने का आनंद भले ही बदलता रहता हो, यहां के रोप वे (रज्जू मार्ग) का महत्व हमेशा बरकरार रहता है। वस्तुत: यहां का सबसे बड़ा आकर्षण यह रज्जू मार्ग ही है। विश्व का श्रेष्ठतम तकनीक से निर्मित, एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा यह रज्जू मार्ग 4 किलोमीटर लंबा है। समुद्र–तल से 1927 मीटर से 3027 मीटर की ऊंचाई तक चलने वाले इस रज्जू मार्ग में 10 विशाल स्तंभ और दो केबिन हैं। प्रत्येक केबिन में 25 लोग बैठ सकते हैं। इसका आठवां स्तंभ औली में स्थित है। यहां पर जो लोग उतरते हैं, उनके लिए यहीं 800 मीटर लंबी चेयर लिफ्ट तैयार खड़ी रहती है। इस हवाई चेयर पर बैठते ही पर्यटक ढलानों का मजा लेता हुआ स्कीइंग सेंटर में पहुंच जाता है।

इस रज्जू मार्ग के केबिन से यहां के विस्तृत भू–भाग के आवासीय क्षेत्र, जंगल, खेत वगैरह तो ऊंचाई से दिखते ही हैं, सामने नजर दौड़ने पर नंदा देवी, द्रोण गिरि, नीलकंठ, मानापीठ, कामेट, हाथी गौरी आदि हिमाच्छादित पर्वतों का विहंगम दृश्य भी दृष्टिगोचर होता है।

गुरसौं बुग्याल
यहां की स्थानीय भाषा में ‘बुग्याल’ चरागाह को कहा जाता है। आप संभवत: यह सोचें कि भला चरागाह भी कोई ‘देखने’ लायक चीज होती है? हां, कम–से–कम यहां की चरागाहें तो देखने लायक ही हैं। वो इसलिए कि अन्य चरागाहों से ये सर्वथा भिन्न होती हैं–प्राकृतिक सुषमा से युक्त।

औली से 3 किलोमीटर दूर यह स्थान मीलों लंबा–चौड़ा चरागाही मैदान है, जो ओक और कोनिफर के जंगलों से घिरे होने के कारण अधिक मनोरम प्रतीत होता है। जाड़े के दिनों में यहां बर्फ जमी रहती है, जबकि गर्मी के दिनों में दर्जनों किस्म के ऐसे फूल खिले रहते हैं, जो जल्दी कहीं देखने को नहीं मिलते।

छत्राकुंड
गुरसौं बुग्याल से 1 किलोमीटर यानी औली से 4 किलोमीटर दूर जंगल के मध्य में स्थित इस स्थान पर साफ और मीठे पानी का एक छोटा–सा सरोवर है। हालांकि यहां विशेष कुछ नहीं है, फिर भी यहां का शांत माहौल और सुहाना दृश्य तन–मन को ताजगी प्रदान करता है।

तपोवन
जोशीमठ–नीति मार्ग पर स्थित ‘तपोवन’ नामक स्थान पर काफी संख्या में पर्यटक आते रहते हैं। यहां का मुख्य आकर्षण गरम जल के प्राकृतिक स्त्रोतों का समूह है। यहां के ठंडेपन में इस गरम जल से स्नान करने का आनंद उठाना पर्यटक नहीं भूलते।

सेलधार
तपोवन से 3 किलोमीटर आगे इस स्थान पर गरम जल के प्राकृतिक फव्वारे हैं। यह जल इतना गरम रहता है कि इससे चाय बनाई जा सकती है। यह फव्वारा देखने में अत्यंत सुंदर लगता है।

जोशीमठ
औली से 12 किलोमीटर दूर यह स्थान थोड़ा नीचे स्थित है। यहां के बारे में किंवदंती है कि आदि शंकराचार्य ने यहीं पर दिव्य ज्योति का दर्शन किया था और यहीं पर ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी। यही ज्योतिर्मठ अपभ्रंश के कारण कालांतर में ‘जोशीमठ’ हो गया और यह पूरा क्षेत्र ‘जोशीमठ’ कहा जाने लगा।

प्राकृति सुषमा, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से अपना विशिष्ट महत्व रखने वाला यह स्थान बदरीनाथ का प्रवेश–द्वार भी है। फूलों की घाटी का भी प्रवेश–द्वार होने के कारण यह दर्शनीय है। तरह–तरह के फलों के पेड़ यहां के खुशनुमा माहौल में और बढ़ोतरी करते हैं।

क्वारी बुग्याल
औली से लगभग 16 किलोमीटर दूर मीलों फैले इस स्थान के ढलान का अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य किसी को भी मोहित कर देता है। यहां से हिमालय की चोटियों और घाटियों का भी नयनाभिराम दृश्य दिखलाई पड़ता है। जिन दिनों मैदानी भागों में भीषण गर्मी पड़ती है, उन दिनों यहां पर लोग तंबू गाड़ कर लेटे–बैठे रहते हैं। ट्रैकिंग करने वालों को यह स्थान अत्यंत प्रिय है।

चिनाब झील
जोशीमठ से 15 किलोमीटर दूर इस स्थान तक पहुंचने के लिए घने जंगल और मखमली घास के मैदान से होते हुए जाना पड़ता है। यहां एक सुंदर झील है, जिसके कारण यहां का दृश्य बहुत मनमोहक प्रतीत होता है। दुर्गम क्षेत्र होने के कारण यहां ठहरने और खाने–पीने की दिक्कतों को ध्यान में रखकर ही यहां आने का कार्यक्रम बनाना हितकर होता है।

औली में उत्सव है ठंड

गढ़वाल के सीमांत जिले चमोली के जोशीमठ विकासखंड स्थित प्रसिद्ध हिमक्रीड़ा स्थल औली जहां अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है वहीं यहां की बर्फीली ढलानें स्की प्रेमियों की पहली पसंद बन चुकी हैं। इस क्षेत्र की पौराणिक महत्ता किसी से छिपी नहीं है। देशी-विदेशी पर्यटकों को भी यह क्षेत्र हमेशा लुभाता रहा है। नेशनल ओपन चैंपियनशिप व राष्ट्रीय शीतकालीन खेल आयोजन के बाद औली अंतरराष्ट्रीय पर्यटक मानचित्र पर भी चमकने लगा है। जोशीमठ से गोरसों तक भारत के सबसे बड़े रोपवे यानी रज्जुमार्ग भी यहां की खास विशेषता हैं। इससे औली तक पहुंचना बेहद आसान हो गया है।
समुद्र तल से 8 हजार फीट से 13 हजार फीट तक की ऊंचाई पर फैले औली को कभी संजीवनी शिखर के नाम से जाना जाता था। पौराणिक गाथाओं के अनुसार हनुमान जी जब संजीवनी लेने हिमालय की इस वीरान पहाड़ी में आए तो उन्हें संजीवनी शिखर औली से ही द्रोणागिरी पर्वत पर संजीवनी बूटी का खजाना दिखा था। कालांतर में यहां हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की गई। संजीवनी शिखर से औली तक का सफर तय करने वाले इस क्षेत्र की प्राकृतिक खूबसूरती का बखान करना शब्दों में संभव नहीं होगा। जिस तरह यहां अलग-अलग मौसम में प्रकृति अपना अलग-अलग रूप दिखाती है उससे यह तो कहा ही जा सकता है कि यहां के नजारे बेनजीर हैं। बरसात में हरियाली ओढ़े औली एक खूबसूरत नवयौवना के रूप में दिखती है, तो शीतकाल में बर्फ की श्र्वेत चादर ओढ़े औली की सादगी भी भव्य रूप में प्रकट होती है।
स्कीप्रेमियों का प्रशिक्षण
औली (संजीवनी शिखर) में क्षेत्र के विभिन्न गांवों की छानियां हुआ करती थीं, जहां गांवों के लोग अपने मवेशियों सहित बसंत ऋतु में प्रवास करते थे। हालांकि आज भी सलूड़-डुंग्रा क्षेत्र के ग्रामीण यहां छानियों में रहने आते हैं। औली को स्कीइंग क्षेत्र के रूप में विकसित कर इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाने की सोच को लेकर आज तो कई मत हैं। बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में पर्वतीय विकास मंत्री रहे बद्री-केदार के तत्कालीन विधायक स्व.नरेंद्र सिंह भंडारी ने इस अनजाने क्षेत्र को विकसित करने की पहल की थी। रज्जुमार्ग व स्कीइंग प्रशिक्षण का शिलान्यास 20 जुलाई 1983 को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी ने किया था। सन् 1984 से ही गढ़वाल मंडल विकास निगम ने यहां स्कीप्रेमियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। वर्ष 1986 से औली में स्कीइंग प्रतियोगिता शुरू हुई तो इस क्षेत्र के विकास को नई गति मिली। वर्ष 1992 तक तो दो वर्षो में एक बार विंटर गेम फेडरेशन ऑफ इंडिया के तत्वावधान में ओपन चैंपियनशिप आयोजित होती रही, लेकिन 1992 के बाद प्रतिवर्ष यह प्रतियोगिता आयोजित होने लगी। औली में वर्ष 2003 में भारतीय ओलंपिक संघ के तत्वावधान में राष्ट्रीय शीतकालीन खेल के आयोजन होने के बाद तो औली विश्व के पर्यटन तथा शीतकालीन खेल मानचित्र पर अपना प्रमुख स्थान बनाने में कामयाब रही।
सबसे उपयुक्त स्की ढलान
राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कीइंग प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए औली के समुचित विकास की जो सोच बनाई गई थी, धीरे-धीरे वह विकसित होती गई। औली को ख्याति दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले भारत के सबसे बड़े रज्जुमार्ग का निर्माण 1993 में पूरा हुआ और इसका उद्घाटन भी 26 फरवरी 1994 हुआ। दस टॉवरों वाले 4.1 किमी. लंबे तथा 50 यात्रियों को एक साथ जिक-बैक सिस्टम से ले जाने वाले इस रोपवे को दो वर्ष पूर्व तक एशिया का सबसे बड़ा रोपवे होने का गौरव भी हासिल था। औली में स्कीइंग प्रतियोगिताओं के लिए रोपवे व्यवस्था होने से स्कीप्रेमी सुकून महसूस करते हैं। पर्यटकों एवं स्कीयरों को आठ सौ मीटर की चेयरकार का सफर भी तय कराया जाता है। यहां 500 मीटर स्की-लिफ्ट भी लगाई गई है, जो स्कीयरों को ढलान से ऊपर लाने का कार्य करती है।
औली की बर्फीली ढलान की लम्बाई पांच किमी से अधिक है। यह स्कीयरों के लिए 25 वर्ग किमी पर फैला हुआ ढलान है। इसके अलावा औली में 60 गुणा 40 मीटर लंबे आइस-स्केटिंग रिंग का निर्माण भी अंतिम चरण में है, जिसमें आईस-हॉकी, फिगर स्केटिंग आदि शीतकालीन खेल खेले जाएंगे। स्कीइंग विशेषज्ञ बताते हैं कि औली का उत्तरमुखी बर्फीला ढलान दुनिया भर में स्कीइंग के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। साथ ही यहां जमी बर्फ की मोटी परतों से हमेशा स्कीयरों को लगाव रहा है। हालांकि उत्तरांचल के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने औली को और विकसित करने के साथ गोरसों टॉप तक रोपवे विस्तार की घोषणा की थी।
अगर यह सपना साकार होता है तो फिर इसके बर्फीले ढलानों में अप्रैल अंतिम सप्ताह तक भी स्कीइंग हो सकती है। औली में लगा रोपवे यूरोप के आस्टि्रया एवं फ्रांस से आयातित है तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों पर खरा उतरता है। इसके अलावा औली में दो स्नोवीटर भी जर्मनी से आयातित किए गए हैं। हालांकि जिस तेजी से औली का विकास हो रहा है उससे पर्यटकों, स्की प्रेमियों को समुचित सुविधाएं तो मिल रही हैं लेकिन जिस प्रकार छानियों से अब कंकरीट के जंगल में औली तब्दील हो रहा है उससे लोगों की चिन्ताएं इसलिए भी बढ़ रही हैं कि कहीं धीरे-धीरे हो रहे पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय असंतुलन से आने वाले समय में औली में बर्फ देखने की वस्तु न बन जाए।

 

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

© 2015 News Way· All Rights Reserved.