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उत्तराखंड की संस्कृति को जान रहे हैं युवा, ‘जागर’ जहां होता है देवी-देवताओं की गाथाओं का गान

उत्तराखंड की संस्कृति को जान रहे हैं युवा, ‘जागर’ जहां होता है देवी-देवताओं की गाथाओं का गान
खोई परंपरा को आज के पीछे तक पहुंचाने के लिए जागर गायिका बसंती बिष्ट अथक प्रयास कर रही हैं. वो नई पीढ़ी को पिछले एक महीने से जागर गायिका बसंती बिष्ट ने नन्हे बच्चों की जागर, मंगलगीत और पारम्परिक लोकनृत्य की बारीकियां सिखा उत्तराखंड जिसे देव भूमि के नाम से जाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इसके आंचल के कण-कण में देवताओं का वास है. उत्तराखंड की वादियों में ही देवाधिदेव महादेव भगवान शिव का भी घर यानि कैलाश पर्वत भी है हमारे देव पुराणों में भी सभी देवी देवताओं का निवास हिमालय के उत्तराखंड अंचल में ही माना जाता है. सभी हिंदू देवी-देवताओं के साथ यहां स्थानीय रूप से पूजे जाने वाले कई देवी-देवताओं का भी यहां की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है.

उत्तराखंड संस्कृति के विविध रंग हैं, जिनमें से एक है यहां की ‘जागर’. उत्तराखंड में ग्वेल, गंगानाथ, हरू, सैम, भोलेनाथ, कलविष्ट आदि लोक देवता हैं और जब पूजा के रूप में इन देवताओं की गाथाओं का गान किया जाता है उसे जागर कहते हैं. वेद, पुराण, शास्त्र, नागों और पहाड़ की लोक परंपराओं का बखान जागरों में है. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में देवताओं का स्तुति गान जागर के रूप में किया जाता है. धार्मिक अनुष्ठानों में जागर द्वारा ही पूजा की जाती है. लेकिन बढ़ते समय के साथ-साथ अब ये लोक परंपरा खो सी गई है. पदश्री बसंती बिष्ट ने जागर को नई पहचान दिलाई है. अब जागर गायिका इस विधा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटी है.
पर्वतीय इलाकों में देवी-देवताओं का स्तुति गान की परंपरा रही है. खोई परंपरा को आज के पीछे तक पहुंचाने के लिए जागर गायिका बसंती बिष्ट अथक प्रयास कर रही हैं. वो नई पीढ़ी को पिछले एक महीने से जागर गायिका बसंती बिष्ट ने नन्हे बच्चों की जागर, मंगलगीत और पारम्परिक लोकनृत्य की बारीकियां सिखा रही हैं. लोकसंस्कृति को संरक्षित करने में जुटी संस्था सोनचिरैया ने इसका आयोजन किया. आयोजकों ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में जागर, मंगल और कई लोकनृत्य विलुप्त होते जा रहे है और इन्हे संरक्षित करना बेहद जरूरी है.
बसंती बिष्ट ने नन्हे बच्चों को केवल जागर के गुर ही नहीं सिखाए बल्कि एक राजस्थान में प्रचलित घूमर लोकनृत्य की भांति ऐडी अछरी नृत्य को भी सिखाया है. ये लोकनृत्य इन्द्रलोक की परियों के पूजन में किया जाता था. उन्होंने कहा कि अगर आज की पीढ़ियां अपनी सभ्यता औक संस्कृति को नहीं जानेंगी, तो आगे की पीढ़ियों को अपनी संस्कृति के बारे में क्या बताएंगे.

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