उत्तराखंड आंदोलन शिक्षित बेरोजगार की नजर से: मितेश सेमवाल

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दौर -1970-80- जब पहाड़ आजादी के बाद नयी किया की सांस ले रहा था यहां पर कुछ प्राकृतिक जगहों पर अंग्रेजी सरकार अपने अच्छे दिनो में मूड में बदलाव करने आते थे .
जैसे मसूरी नैनीताल हिल स्टेशन थे जो अंग्रेजो द्वारा सैर सपाटे के लिये विकसित किये गये . लैन्सडाउन फौज गढ़वाल रेजिमेन के लिये विकसित किया गया जिसने द्वितिय विश्वयुद्ध में बहुत बहादुरी से अंग्रेजो के साथ मिलकर हिटलर एंव मुसेलिनी से लोहा लिया था . तीर्थ स्थलों में गंगोत्री ‘गंगा माँ ¬ का उदगम स्थल’ एंव भागीरथ की तपोभूमी . यमनोत्री ‘माँ यमुना की उदगम’ एंव बद्रीनाथ जी आदिशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित घाट सिद्धपीठों में से एक . एवं केदारनाथ ‘पांडवों द्वारा स्थापित कि गई’.

महात्मा गांधी जी भी पहाड़ प्रेमी थे उन्होंने कुमाऊ जनपद के कासौनी मे अपनी पुस्तक लिखी एंव उसे उत्तराखंड के स्वीजरलैन्ड से तुलना की इसके अलावा पं0 जवाहर नेहरू जी का देहरादून के सर्किट हाउस . वर्तमान में राजभवन .एंव मसूरी से गहरा नता था व वे अपने व्यस्वतम समय से समय निकाल यहां आया करते थे । इसके अलावा लौहा पुरूष श्री सरदार बल्लभ भाई पटेल जी भी देहरादून के सर्किट हाउस से थे जब हैदराबाद विलय की बात हो रही थी .
आज आंदोलन को लगभग समाप्त हुए 18 वर्ष हो गये है . इन 14 वर्षों मे हम से ज्यादा मुख्यमंत्री देख चुके हैं . कुछ के आज भी सोचते है कि क्यों किया आंदोलन । आंदोलन की सबसे मजबूत कडी भी मातृ शक्ति वे मायें जो वर्ष दर वर्ष अपने बच्चों को बड़ा करती और सोचती कि यह कब बड़ा होगा और मैं आराम कर पाऊँगी पर वह जब बड़ा होता तो बेरोजगार युवा बन जाता और मजबुरी में बड़े शहर जाना पड़ता .
आंदोलन का अंत 1999 में हो गया जब केंद्र में नई बनी वाजपाई सरकार ने राज्य की स्थपना कर दी और श्री नित्यनंद स्वामी जी को मुख्यमंत्री बना दिया . पहाड़ का पहला छल नौकरशाहों एंव राजशाहों ने यह किया कि राजधानी गैरसेण के बजाय देहरादून हो गई।
देहरादून में जमीन लेना पहाड़ के लोंगो के लिये स्टेटस सिंबल बन गई पहले लोगों ने पहाड़ का गांव छोड़ा पूरा पहाड़ छोड़ कर मैदान में बसने लगे ।
नई सरकारें पहाड़ में बुनियादी डाचें जैसे चिकित्सा , दवाई शिक्षक पर्यटन नीती आदि पर कुछ भी ठोस ना कर पाई जिसका खामियाजा आज भी पहाड़ियों में है ।
बच्चों को देहरादून में पढ़ाना फैशन बन गया है जमीन जरूरत से ज्यादा इन्वेसटमेंट बन गई एकड से वीधा और वीधे ये जमीन गज के भाव बिकन लगी । जिन लोगों ने बदलते समय को समझ सका उन्हें एक ऐसा बिजनेस मिल गया जो उन्हें एक डील में लाखों कमा के दे सकता है एक सर्वे के मुताबिक सिर्फ देहरादून के पुलिस थानों में 60 प्रतिशत मामले जमीन खरीदने की बेइमानी के है.
करीब तीन दसकों तक चलें इस आंदोलन में हमने बहुत कुछ खोया और पाया पर नीतियां हम आज भी ठोस नही बना पाये। राज्य का नाम ही दो बार बदला जा चुका है । कहा गया कि यह पर्यटन प्रदेश बनेगा पर हम आज भी अपने युवाओं को रोजगार देने में असक्षम हैं ।
कहा गया कि यह हर्बल प्रदेश बनेगा पर हम 14 वर्षो मे एक कलस्टर था हर्बल गा्रम तक विकसित नही कर पायें । कहा गया कि ऊर्जा प्रदेश बनेगा पर हम आज भी निर्णय नहीं कर पाये कि हमें छोटे बांध चाहिये था बडे़ और जो बाहय बन गये उनकी 15%- 20% भी बिजली हमें नहीं मिलती ।
युवा आज भी सिर्फ इस भरोसे पर है कि उसे फौज में नौकरी मिल जाये तो अच्छा है । वरना उसे 7000 या 8000 रूपये में दिल्ली , बम्बई जाना पडेगा और पूरी जिंदगी एक छोटे से कमरे में आता है तो वह पडोसी राज्य हिमांचल को ज्यादा बेहतर सुनयोजित पाता है और वहां विदेश करना ज्यादा सुरक्षित समझता है ।
जब आंदोलन होता है तो मंथन होता है मंथन से निर्णय आते हैं । शायद हमारी भूल यही रही कि हम निर्णय आने के बाद उन कंधो और लोगों पर भरोसा करने लगे जो कभी आंदोलन को हिस्सा बैठे ही नही हम थोडा सुस्ताने लगे कि मंजिल आ गई पर मंजिल अभी कोसों दूर है । जरूरत है एक नई क्रांति की जो लड़े इस नियम से इन नौकरशाहों से और पूछे इन 14 वर्षों के वनवास का हिसाब कि हमने क्या पाया क्योंकि खोने का हिसाब तो बहुत लंबा है । हमारी लंड़ाई तो आज भी वही है हमें संड़क चाहिये, बिजली चाहिये ,स्कूल चाहिये, अस्पताल व डाक्टर चाहिए ।
कहने का तात्पर्य है कि तेजी से विकसित हो रहे देश में पहाड़ का मतलब दून ,स्कूल ,मसूरी , नैनीताल एंव तीर्थ स्थानों तक सीमित हो कर ना रह जाये यही सोच बुद्धीजीवियों को परेशान करती रहती थी । पहाड़ का मतलब सरकारी कर्मचारी के लिए सजा होता था । पहाड़ो को मतलब औरत के लिए पत्थर सा निर्मम जीवन होता था पहाड़ का मतलब युवा के लिए देहरादून दिल्ली , बम्बई, जैसे शहर की छोटी मोटी नौकरी होता था । आंदोलन जन आंदोलन बना नेतृत्व विकसित हुआ और इतिहास गवाह है कि जनता जब जाग जाती है तो शासक पल भर में बदल जाते है ।


उस समय के अखबार ‘दैनिक जागरण‘ एवं ‘अमर उजाला‘ ही सिर्फ आंदोलन की जानकारी जुटाने के एकमात्र साधन थे जिन्हें राज्य सरकारों ने बंद करने की पुरोजोर कोशिश की ।
युवको ने कालेजों पर ताले लगा दिये स्कूलों का बहिष्कार होने लगा नौकरियो पर हडताल होने लगी और शहर के चैराहे पर लोग भूख हडताल एंव धरने करने लगे पर तरीक सदैव शांत रहे ।
सरकार दमनकारी हो रही थी मसूरी गोलिकाड़ हुआ ,श्रीयंत्र टापू पर शांतिपूर्ण तरीके से अनसन करते लोगों केा मैने स्वयं पुलिस की बर्बरता का शिकार होते देखा हैं शाति पूर्वक दिल्ली प्रदर्शन करने जा रहें आंदोलन कारीयो पर बर्बरता की गई़़…..

गोलिया चलाई गई और इंसानियत को पूर्ण रूप से शर्मसार किया गया पर लोग डरे नही रोये नहीं और ना ही हिंसक हुए । आदोलन एक नये रूप में आगे बड़ा और कुछ लोग जो सत्ता को सहेजने लगे है छल करने लगे हैं उनका हिसाब चाहिए, हम मानने लगे है कि सब भष्ट्र है सरकारें निकम्मी हैं । कुछ नही हो सकता पर हम भूल गये हैं कि कुछ सालों पहले हमने रातों को मशालें जलाई थी और एक सुर में कहा था ‘ यह सरकार निकम्मी है यह सरकार बदलनी है‘ बोल पहाड़ी हल्ला बोल हल्ला बोल ।


अब जरूरत है पक्के वादों की है सिस्टम को दुरस्त करने का जरूरत है लोगों को समझाने का कि यह हमारी जन्मभूमी है और इसे हमें बेहतर बनाना है सर्वश्रेष्ठ बनाना है । हमें स्वयं को बेहतर बनाना है और एक परिवर्तन लाना है ताकि हम उन संसाधन एंव सेवाओं को दुरस्त कर सकें जा हमारे युवाओं को बाहर ले जाती है उन लोगों को वापस लाना है जो चले गये । पहाड़ का मतलब लोगो के लिये मनी आर्डर अर्थव्यवस्था होता था क्योंकि पहाड़ों पर खेती सिर्फ वर्षा पर निर्भर होती है और खेत सीडी नुमा होते है जो कि बारिश के पानी के साथ साथ उपजाऊ मिट्टी भी वहा कर ले जाते है ।
जब गौरा देवी ने चिपको आंदोलन शुरू किया तो यह नही सोचा था कि उसे कोई राष्ट्रीय या अन्र्तराष्ट्रीय पहचान मिलेगी वह तो लड़ रही थी सिर्फ उस जंगल उस मूक वृझ को बचाने के लिये जो उसे जलावने, चारा पत्ती, पानी देता था और गनीमत थी की उसका आंदोलन मीडिया की पैनी नजर में आ गया और वह बेचारी गौरा बनने से बच गई ।
इस आदोलन का एक दूरगामी नतीजा यह हुआ कि पहाड़ के सीधे सीधे लोगों को समझ में आ गया कि यदि उद्देश्य सही हो नियत साफ हो और सभी लोग एक साथ हो तो बड़ी से बड़ी ताकत को भी घुटने के बल झुकाया जा सकता है इसी की तर्ज पर फिर जल जंगल एंव जमीन के लिए कुछ और मुखर आंदोलन हुए जैसे टिहरी डैम का आंदोलन….।

परंतु यह सभी आंदोलन क्षेत्र विशेष तक सीमित रहे । फिर 80 के दशक में श्री डी. डी. पन्त जी के नेतृत्व में अलग प्रदेश बनाने की मांग उठी जे. एस बिष्ट रानीखेत जब प्रदेश का बेरोजगार युवा, व्यापारी, मातृ शक्ति संगठित हो रहे थे उस समय उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री एन. डी. तिवारी ने कहा था कि यह राज्य निरर्थक होगा , हा किसी ने नये राज्य के बनने का विरोध किया, यह लडाई आम जनता की हुवम रानो से थी जो मीलों दूर लखनऊ दिल्ली में बैठे थे और जिनके लिये पहाड़ महज सैर सपाटे के अड्डे थे ।
जाने वो कौन सी शक्ति थी कि बिना किसी लोभ के, लालच के , इच्छा के हर व्यक्ति संगठित हो रहा था नेतृत्व विकसित हो रहा था और श्री इन्द्रमणी बडोनी जी जिन्हे सीमान्त गाधी, भी कहा गया है की अगुवाई में स्वतंत्र भारत का शायद सबसे लंबा शांतिपूर्व आंदोलन चला तत्कालीन सरकारों ने आंदोलन को कुचलने की पुरजार कोशिश की पर पहाड़ी ठान चुके थे कि वे अब अलग राज्य ले कर रहेंगे ।

मितेश सेमवाल